Monday, January 11, 2021

हम शर्मिंदा नहीं हुए अब तक

 और अन्तत: सूरज खिला

राजधानी की सीमाओं पर बैठे किसानों के चेहरे पर
ओस की बूंदे आज उड़ी हैं
सूरज ने आज अपना काम ठीक से किया है
सूरज जानता है
फसल की बालियों को छूकर ही
उसकी किरणों को मिलता है श्रृंगार
बनते हैं गीत
मिलता है नया रूप
लिखी जाती है कविता
दरअसल सूरज ने नमक का कर्ज अदा किया है
जो उसने सोंका था
चैत में किसान की देह से
किसान की लड़ाई में
आज शामिल होकर उसने
जताया है अब आभार
बजंर धरा पर उसे कोई नहीं पूजेगा
जानता है वह ...
हमने अब तक नहीं चुकाया है
अन्नदाताओं का कर्ज़
हम शर्मिंदा नहीं हुए अब तक
क्यों .....!!

Saturday, January 2, 2021

दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के भीगे हुए चेहरों को सोचिये

 हो सकता है

इस वक्त जब दिल्ली में
आकाश बरस रहा है
और आप रजाई में बैठ
गर्म चाय की चुसकी लेते हुए
अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे हों
ठीक इसी वक्त दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के
भीगे हुए चेहरों को सोचिये
एक बार
ठंड में ठिठुरते हुए
उनके होंठों को सोचिये
आखिर वे क्यों बैठे हैं
क्यों अब तक पांच दर्जन जाने चली गईं?
सोचिये इस सवाल को एक बार
इस वक्त जब उन्हें होना चाहिए था
अपने खेतों पर
वे मजबूर हैं सड़क पर सोने को
इस बारिश से राजपथ चमक उठे शायद
किंतु किसानों के खून का गंध शेष रह जायेगा
सत्ता किसी अपराध पर
शर्मिंदा नहीं होती
किन्तु जो अश्लील ख़ामोशी
हमने ओड़ ली है
उसका जवाब कौन देगा ?


Sunday, December 13, 2020

मैं तो अपने लोगों के साथ सिंघु बॉर्डर पर हूँ

 किसी को नहीं दिखता

जमीन के नीचे
उबलते लावा का रंग
अब पढ़ते हैं
तस्वीर में
मेरा चेहरा
बढ़ी हुई दाढ़ी
और ....
कुछ नहीं
मने मेरा कवि मर गया है
खो गया है कहीं
मैं तो अपने लोगों के साथ सिंघु बॉर्डर पर हूँ
टिकरी पर हूं
मैं चीनी और पाकिस्तानी सीमा पर भी हूँ
ये सत्ता मुझे पहचान कर भी पहचान नहीं पाती है ।
कारण आप जानते हैं
इंक़लाब ज़िंदाबाद कहने के लिए
56 इंची सीना नहीं चाहिए
सिर्फ जागरूक नागरिक होना काफी है ।

Friday, December 4, 2020

उसने बूढ़े किसानों को देश के 'जवानों' से लड़ा दिया है

 अपनी जमीन और देश को भुखमरी से

बचाने की लड़ाई में
शहीद हो गये कई किसान
तानाशाही सत्ता ने पूंजीपतियों से
किसानों की हत्या की सुपारी ली है
वृद्ध शरीर ने वाटर कैनन से निकलती तेज पानी के बौछारों को
डट कर सहा है
सरकारी आंसू गैस के गोले
कंटीले तार के बाड़ों को लांघते हुए
झुर्रियों वाले चेहरे के
अन्नदाताओं ने
सत्ता की नींद उड़ा दी है
खुली सड़क
खुले आकाश के नीचे
इन सर्द रातों में
मेरे देश के धरती पुत्रों को
किसने उतारा है
क्या हम नहीं पहचानते उसे?
वह शैतान
सत्ता के बल पर लगातर हंस रहा है
हमारी कमजोरी पर
उसने बूढ़े किसानों को
देश के 'जवानों' से लड़ा दिया है
जी, हाँ वही जवान जो
इस जमीन की रक्षा करता है
जिस पर किसान अन्न उगाता है

पर अब वो शैतान
किसानों को
कह रहा है -खालिस्तानी ,
देशद्रोही !
उनका जनरल कह रहा है -
देखने से नहीं लगते ये किसान हैं !
और उनके पालतू कुत्ते भी
उन्हीं की बात पर
स्टूडियों से भौंक रहे हैं
मैं कितना असहाय और कायर हो गया हूँ
कि, कमरे में सुरक्षित बैठ कर कविता लिख रहा हूँ
और उन्हीं का उगाया अन्न खा रहा हूँ
जबकि इस देश में अन्न उगाने वाला हर रोज
लगाता है फांसी
पी लेता है ज़हर
अपना हक मांगते हुए
कभी सरकारी बंदूक की गोली से
हो जाता शहीद !!
और तानाशाही निज़ाम उपहास करते हुए कहता है
कोई नहीं मरा है कर्ज़ से
भूख से
मरना उनके लिए फैशन बन चुका है
वे किसी प्रेम प्रसंग में मरे हैं !!



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Monday, November 23, 2020

उम्मीद और वादों से अब डर लगता है

 कविताएं मरती नहीं कभी

छिप सकती हैं
अक्सर छिपा दी जाती हैं
षडयंत्र कर
ताकि पुरस्कार के लिए घोषित नाम पर
शर्मिंदा न होना पड़े
गैंगबाज, कलावादी आलोचक चयनकर्ता को
एक कवि मर गया ...कर्ज़ और भुखमरी से
फाउन्डेशन वाले आलोचक ने क्या किया ?
कवि के मरने के बाद दुधिया दांत दिखाते हुए अफ़सोस की उलटी की
एक कविता संकलन छपवा दिया
इसी तरह वो फिर महान हो गया
क्रांतिकारी टाइप तमाम लौंडे कवि
उसके ब्रांड का झोला उठा कर घूमते दिखे हमको मेले में
आज उन सबको सरकारी नौकरी है !
मुझको बोला एक दोस्त ने - कर लिए क्रांति ?
हम बोले ... अब भी शर्मिंदा नहीं हूँ
सरकार की औकात अब भी नहीं
मुझे खरीद सकें
हाँ, जो दलाल थे कवि बने हुए
उनको हमने देख लिया है ...
आगे तो इतिहास होगा -
कौन , कब कहाँ छिपा था
कौन किसे धोखा दे रहा था ..
हाँ, विश्वास अब मर चुका है ..
उम्मीद और वादों से अब डर लगता है
नारों की बात ना करो ...
रात की गहराई ही जाने सन्नाटे का राज

Friday, October 30, 2020

मेरी कविताएँ सहम कर कहीं छिप गयी हैं

महामारी ने क्या-क्या संक्रमित किया

पता नहीं,
पर, जो कुछ जीवित है
सब संक्रमित हुए होंगे
एक दोस्त ने पूछा -
ठीक हो तुम ?
मेरा जवाब था -
अब तक संक्रमित नहीं हुआ हूँ
सांसे चल रही हैं
और शायद सोच भी लेता हूँ कुछ -कुछ
कई बार बहुत कुछ !
मेरे जवाब के बाद उसने लम्बी साँस छोड़ी
दरअसल उसका सवाल था -
आजकल कविता क्यों नहीं लिख रहे ?
उसे हैरानी हुई होगी
दुःख हुआ होगा शायद
मैं उसे बताना चाहता था कि
आपदा में कविताएं नहीं
हालात लिखे जाते हैं
रपट लिखी जाती हैं
लाशों के बीच क्या कविता लिखें !
दरअसल कविताएँ भी तो कभी-कभी सहम जाती हैं
मेरी कविताएँ सहम कर कहीं छिप गयी है
महामारी के दौर में एकांतवास ही सबसे सुरक्षित उपाय है
बचे रहने के लिए
मैं तो अपने दोस्त से यह भी कहना चाहता था, कि
एक अस्सी पार युवा क्रांतिकारी कवि
वरवर राव के एकांत पर सोचे हो कभी
चौरासी साल का एक और जवान
स्टेन स्वामी अचानक कैद कर लिए गये
उन्हें तुम जानते हो क्या ?
मैं अपने दोस्त से पूछना चाहता था
उन अनगिनत लोगों के बारे में
जो एकदिन सडकों पर धकेल दिए गये
महामारी से रक्षा के नाम पर
और कहीं गायब हो गये वे !
मैंने नहीं पूछा अपने उस दोस्त से
विस्थापन के दर्द के बारे में
क्योंकि सूखे और बाढ़ की पीड़ा किसान ही भोगता है
भूख से मरे बच्चों की याद तक नहीं आती हमें दाल मक्खनी बनाते वक्त
मेरा दोस्त चाहता है
मैं कविता लिखूं !
मुझे लगता है
अब कवियों को कविता नहीं,
हिसाब लिखना चाहिए
हर ज़ुल्म का
आपदा में बचे रहने का यही उपाय
सबसे कारगर है
कवि के लिए
मैं भूख से मरते एक बच्चे को नहीं बचा सकता
और नहीं छुड़ा सकता एक कवि को कैद से
ऐसे में मैं क्या लिखूं कविता
मेरे दोस्त ??

Wednesday, September 16, 2020

राजा से हर मौत का हिसाब लेना चाहिए

नये भारत की सरकार
मारे गए नागरिकों की गिनती नहीं करती
मने किसी सरकारी खाते और डेटाबेस में
कोई रिकार्ड नहीं रखती
दरअसल आसान भाषा में समझ लीजिए
कि सरकार अब लाशों की गिनती नहीं करती

सरकार तो अब जीते हुए लोगों को
लाश बनाकर छोड़ देती है

राजा का सिंहासन जब लाशों की ढेर पर रखा हो
तब लाशों की गिनती भी अपराध माना जा सकता है
राजा इसे 'एक्ट ऑफ गॉड' यानी ईश्वरीय कृत
या लीला भी करार देकर बरी हो सकता है
राजा आखिर राजा होता है
वह कुछ भी कर सकता है
राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि कहा जाता है
ईश्वर द्वारा किये गए हत्याओं को किसी अपराध
या पाप की श्रेणी में नहीं गिना जाता
जो मरा वही पापी हो जाता है !

मजदूर, किसान, बेरोजगार को
राजा अब नागरिक नहीं मानता
वह सवाल पूछने वालों, काम मांगने वालों
और भूख में खाना मांगने वालों को देशद्रोही कहता है

राजा उनकी हत्या का आदेश नहीं देता
सिर्फ बेघर कर देता है
सड़क पर ला देता है
उनकी झुग्गियों को उजाड़ने का आदेश जारी करवाता है
राजा अस्पताल की ऑक्सिजन सप्लाई बंद करवा देता है

प्रजा राजा की भक्ति और राष्ट्रवाद की भावना के बोझ से
खुद को मुक्त नहीं कर पाती

किसान फांसी लगा लेता है
बेरोजगार युवा ज़हर पी लेता है
रोटियों के साथ रेल से कटकर मर जाता है
मजदूर का परिवार
और इस तरह मरते हुए वह
राजा को हत्या के आरोप से बचा लेता है

जबकि मैं सोचता हूँ इसके विपरीत
असामयिक हुई हर मौत के लिए 

राजा ही दोषी है
भूख से मरे हर नागरिक का क़ातिल है राजा
क्योंकि भूख से मरना भूकम्प से मरना नहीं है
किसान आत्महत्या दरअसल हत्या है राज्य द्वारा

ऐसी तमाम मौतों के लिए केवल राजा को ही
दोषी माना जाना चाहिए !
उससे एक -एक मौत का हिसाब लेना चाहिए ।।

हम शर्मिंदा नहीं हुए अब तक

  और अन्तत: सूरज खिला राजधानी की सीमाओं पर बैठे किसानों के चेहरे पर ओस की बूंदे आज उड़ी हैं सूरज ने आज अपना काम ठीक से किया है सूरज जानता है ...