Thursday, January 10, 2019

सबको सत्ता चाहिए

और इस तरह उसने संविधान में बदलाव कर दिया
इस हरकत में कथित विपक्ष में बैठे सभी ने उसका साथ दिया
सबको सत्ता चाहिए ,
संविधान की परवाह किसे थी , किसे है ?
सत्ता के लिए ही तो 
मंदिर-मस्जिद गोत्र -जिनेऊ देखने -दीखाने का सिलसिला शुरू हुआ है
प्रजा का क्या करें ?
वह तो उलझी हुई है बेमतलब के मुद्दों में,
बुद्धिजीवी लोग कहीं मेले में हांड रहे हैं ....
किसी मंच से कवि -राग गा रहा है
जन्तर-मंतर से संसद मार्ग तक कुछ चेहरे
जुलूसों के पीछे -पीछे चल रहे हैं
न्यायालय ने अपना अधिकार क्षेत्र निर्धारित कर लिया है
नगर की दीवारों पर लगे पोस्टरों पर
एक आदमी मुस्कुराते चेहरे के साथ
तमाशा देख रहा है
गौशाला से गायें आधी रात में रंभाती या
रोती हुई दिखाई देती हैं
शासन ने अपने सांड़ों को सड़क पर उतार दिया है
राजा के सिपाही मुस्तैदी से लाठी को तेल पिला रहे हैं

Tuesday, November 27, 2018

राजपथ पर नंगे पाँव चलते नागरिक पहचानते हैं मुझे

अब यदि कोई पूछ लेता है परिचय -क्या करते हो कह कर
उनसे कहता हूँ
- दास नहीं हूँ
राजा के घोड़ों को घास नहीं डालता
न ही पिलाता हूँ पानी उनको 
कहता हूँ - मजदूर हूँ
जिन्दगी की लड़ाई में व्यस्त हूँ
कहता नहीं हूँ अभिमान भाव से उनसे
कि कवि हूँ
पर कवि के पक्ष में हूँ
जो किसान -मजदूर और शोषितों की हक़ की लड़ाई में शामिल हैं
राजपथ पर नंगे पाँव चलते नागरिक पहचानते हैं मुझे
राजा से मेरा कोई रिश्ता नहीं है
उनके जलसे में शामिल तमाम लोग मुझे नहीं पहचानते
यही मेरा परिचय है !

Saturday, November 10, 2018

इस पीड़ा का क्या करें

बीते दिनों में
कोई कविता नहीं बनी
लगता है दर्द में कुछ कमी रह गई
पर बेचैनी कम कहाँ हुई है
क्यों भर आती है आँखें अब भी 
तुम्हारे दर्द में
मजदूर की पीड़ा कम कहाँ हुई है
किसान ने फांसी लगाना बंद कहाँ किया
भूखमरी में कमी कहाँ हुई है
निज़ाम ने छलना कहाँ बंद किया है ?
हमको जाना है
चले जायेंगे
पर इस पीड़ा का क्या करें ?

Monday, September 17, 2018

यही मैं ही इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा

मानव सभ्यता के सबसे क्रूर समय में जी रहे हैं हम हमारा व्यवहार और हमारी भाषा हद से ज्यादा असभ्य और हिंसात्मक हो चुकी है व्यक्ति पर हावी हो चुका है उसका मैं इस मैं पर हमारा कोई बस नहीं है मेरा मैं गालियां बकने लगा है हत्या करता है फिर भी शर्मिंदा नहीं होता किसी अपराध पर मैं शर्मिंदा होना चाहता हूँ हर अपराध के बाद किन्तु मेरे मैं का अहंकार इतना मगरूर हो चुका है कि अपराध का अहसास होने पर भी वह शर्मिंदा नहीं हो पाता और तब भी बड़ी बेशर्मी के साथ खुद को मनुष्य बताते हैं हम इसी मैं ने ही आपसी रिश्तों को शर्मसार किया है यही मैं ही इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा

Monday, August 13, 2018

डरा हुआ हूँ उनसे जिन्होंने.....

मैं बहुत डरा हुआ हूँ 
किसी दुश्मन से नहीं 
किसी हमलावर से नहीं 
बल्कि उन लोगों से 
जो जीवित हैं 
किन्तु उनका ज़मीर मर चुका है 
डरा हुआ हूँ उनसे 
जिन्होंने अब भी चुप्पी साध रखी है 
और सबसे ज्यादा भयभीत हूँ 
उन कवियों से 
जिनकी कलम से गायब हो चुका है 
प्रतिरोध |

Monday, July 2, 2018

बहुत साधारण हूँ

जी ,
मैं नहीं हूँ किसी बड़े अख़बार का संपादक
न ही कोई बड़ा कवि हूँ
बहुत साधारण हूँ
और बहुत खुश हूँ
आईना रोज देखता हूँ ...
कविता के नाम पर
अनुभव और संवेदना लिखता हूँ
दबे कुचलों की कहानी लिखता हूँ
समाचार के नाम पर
रात को अक्सर मैं भी रोता हूँ
इन्सान की तरह

Wednesday, June 20, 2018




अपने समय के तमाम खतरों से जानबूझकर टकराते हुए कविता लिखने का साहस कवि नित्यानंद गायेन की विशिष्टता है। बेशक, इसमें पहचान लिए जाने का खतरा भी शामिल है। ऐसे कठिन समय में जब हर सत्यशोधक और प्रगतिशील सोच का श$ख्स फासीवादी ताकतों से ट्रोल हो रहा है नित्यानंद गायेन का कविता लेखन दुस्साहसिकता का प्रमाण है। आजीविका के सवालों से जूझते हुए और स्थाई कैरियर की चाह में भटकते हुए अधिकांश युवा कवि, कविता को एक पार्ट-टाईम शगल समझने लगते हैं। कवि नित्यानंद गायेन कैरियरिस्ट नहीं हैं, समझौता-परस्त नहीं हैं और शायद इसीलिए साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और फासीवादी ताकतों के खिला$फ शंखनाद की आवश्यकता के साथ प्रेम की स्थापना पर भी बल देते हैं। थोथा राष्ट्रवाद और धार्मिक उन्माद की अफीम कुछ अरसे तक युवा जगत को भरमाए रख सकती है लेकिन लम्बे समय तक इसे एक टूल्स की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। जर्मन और हिटलर की पुनरावृत्ति की कोशिशें एक बार फिर पूरी ताकत से सर उठा रही हैं। उन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिल रहा है लेकिन यह बात साबित होती जा रही है कि भारत की जनता को इस पागलपन के वायरस से ग्रसित नहीं किया जा सकता है। भारत देश विविधता में एकता की अनोखी मिसाल है। प्रबल राजनीतिक इच्छा-शक्ति और जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए तमाम सवालों के सार्थक समाधान ढूंढने का विकल्प हमेशा खुला रहता है। यह सभी बातें कवि नित्यानंद गायेन की कविताओं में बखूबी उभर कर आती हैं। -अनवर सुहैल


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सबको सत्ता चाहिए

और इस तरह उसने संविधान में बदलाव कर दिया इस हरकत में कथित विपक्ष में बैठे सभी ने उसका साथ दिया सबको सत्ता चाहिए , संविधान की परवाह किस...