Monday, July 30, 2012

मैं खोज रहा हूँ ,कविता

वे खोज रहे हैं 
कविता में शिल्प और सौंदर्य 

मैं खोज रहा हूँ ,कविता
किसान के खेत में 
मजदूर के पसीने में
बच्चों की हंसी में
उजड़ चुके जंगल में
सूख चुकी नदी में

सभी जगह मिली मुझे
शिल्पहीन कविता
सौंदर्य के नाम पर
मिली मुझे सिर्फ गहरी वेदना ...

Wednesday, July 25, 2012

बच्चों की हंसी

वे बच्चे 
जो, गवाह हैं
जंगल महल से 
हिरोशिमा, नागासाकी 
फिर वियतनाम से लेकर 
ईराक से अफगानिस्तान तक 
कभी 
मुस्कुरा उठे गर 
रोते –रोते
उस रात , चाँद भी हंसेगा शायद आकाश का

जिस दिन
विदर्भ , बस्तर
और देश के हर कोने से
बंद हो जायेगी
खाली बर्तनों की आवाज़
उस दिन खिल उठेगा
हर चमन में हंसेगा फूल

बंदूक की आवाज़ बंद होने पर
जब रातमें
चैन से सोयेगा
पूरा देश
और ..
मुस्कुरा देंगे बापू
राजघाट की समाधी से ...
मैं फिर पढूंगा भारतीय संविधान का 

तीसरा अध्याय ......

Monday, July 23, 2012

तुम इतनी टूट चुकी हो ...?


मैं , अक्सर
तुम्हे सोचता हूँ
खोजता हूँ
हवा में , पानी में
पहाड़ों में, जंगलों में
मिट्टी में
तुम्हे पाता हूँ
हर बार टुकड़ों में
हे प्रकृति
तुम इतनी टूट चुकी हो ...


सिमटकर रह गई हो
सिर्फ किताबों में ..?

दूषित हो चूका है 
जल ,वायु
मिट्टी खो चुकी है खुशबू
हार गए जंगल, लड़ते –लड़ते
तुम्हारे बनाये हुए इंसानों से

क्या फिर कभी मिलोगी
अपने असली रूप में
हम इंसानों की
मौजूदगी में ?

Tuesday, July 17, 2012

.तब कहीं पनाह न मिलेगी हमें ......


वे सारी चट्टानें
जिन्हें तोड़ा गया
मशीन की चोट से
बेजान समझकर
जिनके जन्म स्थान पर
खड़ी  हो गई
गगनचुम्भी इमारतें
वे चट्टानें, जिनके
टुकड़े –टुकड़े कर
बिछा दिया है 
जमीन पर
चीख उठेंगे एक दिन
अपनी सम्पूर्ण पीड़ा के साथ
 तब हम हो जायेंगे
बहरे, गूंगे और अंधे
फिर एक बार ..

वे सभी वृक्ष
जिन्हें काट दिया हमने
बेरहमी से
विकास के नाम पर
वे सभी पक्षी
छीन लिए जिनके
 आशियाने हमने
अपने सुख की  खातिर
कर देंगे विद्रोह
भयानक रूप लेकर 

तब हम भागते फिरेंगे
अपने जीवन के लिए
पर ..तब कहीं
पनाह न मिलेगी हमें ......


Saturday, July 14, 2012

उन्हें माफ़ है सब...

वे ,
जो लूट रहे हैं
बोल कर झूठ
उन्हें माफ़ है सब|

जिन्होंने बड़ा ली है
दाढ़ी , मूछ
और केश
गेरुआ वस्त्र पहनकर
बन वैठे हैं बाबा
उन्हें माफ़ है सब |

वे , जो
पहन कर टोपी
हमें पहना रहे हैं टोपी
और मंच पर चढ़ कर
पहनते हैं नोटों की माला
और होते गए मालामाल
जिनके भीतर का गीदड़
पहने हुए हैं , आदमी की खाल
उन्हें माफ़ है सब

जो लगवाते हैं आग
उजाड़ देते हैं
पूरी बस्ती
ताकत के जोर पर
करते हैं मस्ती
वो , जो
बीच सड़क पर
उतार लेते हैं ..
आबरू एक नारी की
रौंद कर चल देते हैं
सोते हुए बेघरों को
उन्हें माफ़ है सब

जो फेंक जाते हैं
हिंसा की ढेर
परंपरा के नाम पर
 सुना देते हैं प्रेमिओं को ,
 मौत का फरमान
उन्हें माफ़ है सब

ये वही लोग है
जो जिम्मेदार है
किसानों की  मौत के लिए
ये वही लोग हैं
जो छीन रहे हैं हमसे
जल ,जंगल और
हमारी जमीन
इन्हें सब माफ़ है
ये मेरा देश है ......

Sunday, July 8, 2012

सार्थकता जीवन की



तब होगी
मेरे जीने की सार्थकता
यदि उठा सकूं
आवाज़, तुम्हारे पक्ष में
तुम्हारे ह्क़ के जीत के लिए
वर्ना, व्यर्थ है
यह जीवन जीने के लिए |

सार्थक होगा
यह जीवन,यदि
कह सकूं मैं सच
बेवाकी से
जल्लाद के समक्ष
और मिट जाये
मौत का डर |

Friday, July 6, 2012

जीवन पथ पर


१.जीवन पथ पर

जीवन पथ पर
तुम्हारी चाह ने
कई पडाव पर
किया है मुझे
निर्जीव

अकेला चला
फिर पुनर्चेतना के बाद
रुक कर
सघन वृक्ष की छावं में
सोचता रहा
कहानी हर पडाव की
झूट ,कपट और छल को

तुम्हे समझने में
बड़ी देर हुई
आज शर्मिंदा हूँ
चाह पर अपनी

दिल की धड़कनों में
फिर बज उठी है
“एकला चलो रे”
जीवन पथ पर
साथी है अब यही धुन ...


२.ताकि फिर आ सके बहार

मैं फिर सीचुंगा
इस उजड़े बाग को
ताकि आये बहार
तुम्हारे जीवन में
फिर एक बार

मैं फिर सीचुंगा
ताकि भर जाये
नग्न शाखाएं  हरे पत्तों से
 हर तरु की 
और बहने लगे
मंद शीतल पवन
आंगन में हमारे

मैं फिर सीचुंगा
ताकि लौट आये 
सभी तपस्वी
जो, चले गए रूठ कर
और भर जाये
यह तपोवन फिर एक बार ....

Sunday, July 1, 2012

नन्ही परी

तुम्हारी मीठी मुस्कान
रह जायेगी यादों में 
वक्त बीत जायेगा 
छोड़ जायेगी 
एक परत पलटने को 

तुम न बदलना 
वक्त के साथ 
नन्ही परी 

एक संजीवनी है 
तुम्हारी  इस मुस्कान में 
जी उठेंगे कई मूर्छित 
जो हार गए हैं 
जीवन की  रण भूमि पर ......



मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप चीख़ कर रोना चाहते हैं किन्तु रो नहीं सकते ! कैसा लगता है तब ? तकलीफ़ होती है न ? मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से ...