Friday, November 17, 2017

कौन बेगुनाह और कौन अपराधी

मैं बदसूरत हूँ
इसलिए बेईमान कहलाऊंगा
चोर और बेईमानों का आकलन
अपने देश में
चेहरे की सुन्दरता पर निर्भर है !

जैसे धर्म के आधार पर तय कर लिया जाता है
कौन है आतंकवादी
पार्टी के आधार पर तय होता है
गद्दार और देश प्रेमी
ठीक उसी तरह तय होता है
चेहरे की मासूमियत पर
कौन बेगुनाह और कौन अपराधी
वफ़ा और बेवफ़ा के किस्से
बनते हैं एक तरफा बयान से
वक्त कहाँ न्यायाधीश के पास
कि दोनों का पक्ष सुने ?
हमने दोस्त मान कर उन्हें करीब से जाना है
हमारा यकीन ही
हमारा अपराध है
यह विनिवेश का युग है
विनिमय में कुछ तो दीजिए
हमने अपना यकीन दिया
और बदले में
धोखा पाया !

Thursday, November 16, 2017

तोड़ने और नोचने में फ़र्क तो होता है

तोड़ने और नोचने में फ़र्क तो होता है
पर दोनों की क्रियाओं में हिंसा होती है
नोचने का निशान गहरा होता है
हो सकता है दिनों -महीनों तक घाव से रिसता रहे पानी
और टूटा हुआ बिखर जाता है
हम सब इस समय
नोचे जा रहे हैं
तोड़े जा रहे हैं
और हम उन नोचने , तोड़ने वालों को पहचानते हुए भी
लगातर ख़ामोशी से पीड़ा सह रहे हैं
हमारी ऐसी क्या मज़बूरी है ?
बात केवल क्रूर और निरंकुश सत्ता की नहीं है
हमारे आस-पास भी तमाम ऐसे हाथ और नाख़ून हैं
जो तोड़ने - नोचने में माहिर हैं
अक्सर उनकी शिकायत करने से कतराते हैं हम
आखिर हमारी मज़बूरी क्या है
ज़रूरी नहीं कि केवल हाथ और नाख़ून ही नोचें हर बार
इनदिनों शब्द /भाषा भी बहुत धारदार हो चुकी है
और जुबान से नोचने -टूटने का कोई निशान दिखाई नहीं पड़ता
उदास किसी चेहरे को पढ़ना हमने सीखा नहीं अभी तक
मृत देह पर अफ़सोस जताना मानव सभ्यता की प्राचीन परम्परा है
जबकि जीवित किसी मनुष्य को ख़ुशी देना
हमारी आदत नहीं बनी !
मनुष्य सदियों से हिंसा के पथ पर अग्रसर है
वह आधुनिक से अतिआधुनिक होने का दावा करता है
उसका हासिल है -हिंसा , नफ़रत , द्वेष और युद्ध
जंगल,
जमीन,
नदी , पर्वत
और लाखों विलुप्त जीव गवाह है !
अब हत्यारों के मंदिर बनायें जा रहे हैं
अपने देश में !

Monday, November 13, 2017

बच्चों ने शैतान को देखा है

बच्चों ने किसी ईश्वर को नहीं देखा है
पर उन्होंने देखा है जंग और शैतान को
इराक़ में,
अफ़गान में,
या फिर फिलिस्तीनी बच्चों से पूछिएगा कभी 
शैतान कैसा दीखता है ?
वे कहते हैं - शैतान दीवार के उस पार से आया है !
अफ्रीका से एशिया तक बच्चों ने शैतान को देखा है
भूख है उसका नाम !
शैतान परिधान बदल -बदल कर आता है
वह कभी बूट पहनकर हाथ में बंदूक लिए
कदमताल करते हुए प्रवेश करता है
तो कभी आता है किसी धार्मिक ठेकेदार के रूप में
वह कल्याण के नाम पर आता है
और विनाश कर जाता है
हत्या करना शैतान के बांये हाथ का खेल है
बच्चों को गुमराह करने के लिए किताबों,
कहानियों और इतिहास में बदलाव चाहता है शैतान
शैतान खुद को
ईश्वर का वरदान कहता है !
खाड़ी से लेकर वियतनाम तक के बच्चे बताते है शैतान का नाम अमेरिका है
फिलिस्तीनी बच्चों ने कहा -उसका नाम इज़राइल-अमरीका है !
बच्चों ने बताया है कि शैतान हर वक्त अकेला नहीं आता उनके देश में
अपने दोस्तों को भी लाता है हमला करते समय
उस वक्त वह प्यासा और भूखा होता है
मांस खाता है और इंसानी लहू पीता है शैतान
शैतान अंग्रेजी बोलता है !
शैतान तेल और खनिज माफिया बन कर भी आता है अक्सर बच्चों के देश में 
भारत के बच्चों ने शैतान का नाम नहीं बताया
कुछ भात-भात चीखते हुए मारे गये हैं
किसानों ने शैतान का नाम नहीं बताया
उन्होंने ज़हर पी लिया कर्ज़ा लेकर
कुछ ने फांसी लगा ली !

Tuesday, October 31, 2017

कविता के पक्ष होना मतलब जीवन के पक्ष में होना है

कविता करना या लिखना कोई पेशा नहीं है 
कविता करना 
मतलब जग और जीवन से परिचित होना है मेरे लिए 
वैसे भी जीवन में कविता के प्रवेश के बाद हमने ठीक से जीना सीखा है
मर के भी जीवत रहने की कला केवल कविता में है
यह जानने के बाद ही जीवन का होना सार्थक लगता है
कविता जीवन है
मनुष्य की तमाम कमज़ोरियों से परिचित किसने कराया हमें
जबाव है कविता
इसलिए कविता के पक्ष में रहना ही
अपने पक्ष में रहना है
हमारी तमाम संवेदनाएं जब कमज़ोर पड़ने लगें
और कभी जब यह अहसास होने लगे कि हम मर रहे हैं
पर हमारी सांसों का चलना जारी है
उस वक्त सबसे कमज़ोर हो जाते हैं हम
तब कोई सुंदर कविता हाथ थाम कर यदि कह दें हमसे कि यही जीवन है
एक नई उंमग जग सकती है हमारे भीतर
जीने की प्रबल चाह उभर आती है
ऐसे में निराश मन में नई ऊर्जा का सृजन होता है
पतझड़ में वसंत आता है
इसे ही कविता कहते हैं शायद
पर मेरा यकीन है
यही कविता है
चिकित्सा विज्ञान हमारी तमाम शारीरिक बिमारियों का उपचार कर दें,
संभव है आज
किन्तु दिल में सुकून कोई मधुर कविता ही भर सकती है
दुनिया की तमाम महान क्रांतियों की कहानी पढ़ कर देखिये कभी
उनमें हर समय नई ऊर्जा की कवि की रचना ने भरी है
हर जन-क्रांति में कोई न कोई कवि शामिल हैं अपनी कविता के साथ
इसलिए कविता के पक्ष में होना
मनुष्य के पक्ष में होना है
जीवन के पक्ष में होना है
जनहित में मानवता के पक्ष में होना है !

Tuesday, October 17, 2017

पहले ईश्वर नामक प्राणी मरा

पहले मंगल पर पंहुचे
फिर चाँद पर
बड़े सा पुल राष्ट्र को समर्प्रित हुआ
मन की बात का प्रसारण जारी रहा
जमीन पर कुछ किसान मारे गये
एक बच्ची भूख से मर गयी बिलकते हुए
उन्होंने राष्ट्र के नाम सन्देश दिया
ताज महल हमारी संस्कृति नहीं
मैंने असफल प्रयास किया
एक प्रेम कविता रचने की
पहले ईश्वर नामक प्राणी मरा
फिर मेरी संवेदनाएं |

Tuesday, October 10, 2017

हमारी स्मृतियों के साथ खेल रहे हैं वे

हमारी स्मृतियों के साथ खेल रहे हैं वे
याद कीजिए हम क्या -क्या भूल गये हैं इस दौरान
वे सभी लोग
जो शहीद हो गये
निरंकुश सत्ता से हमारे हक़ की लड़ाई में 
वे बच्चे,
जिन्हें शासन की बंदूक ने यतीम बना दिया
आखिरी बार कब याद आये हमें उन लोगों के चेहरे
बंदूक की नोक पर जिनसे छीन ली गयी
उनकी जमीन और जंगल
इसी तरह हम
वे तमाम बातें भूल गये हैं
जिन्हें भूलना सबसे घातक है भविष्य के दिनों के लिए
उनका काम है
हमारी स्मृतियों से खेलना
वे, जो उस तरफ खड़े होकर
हंस रहे हैं हम पर
बखूबी जानते हैं
कैसे बदला जाता है इतिहास
वे केवल किताबों से ही नहीं
जमीन से भी गायब कर देते हैं आदमी को
हमारी ये भूलने की आदत
एक दिन हमको भूला देगी
और तब किसी इतिहास की किताब के किसी कोने में भी
हम खोज नहीं पायेंगे खुद को
तब सभी किताबें जल चुकी होगी नफ़रत की आग में !

Monday, August 28, 2017

वक्त हम पर हँस रहा है

हादसों के इस दौर में
जब हमें गंभीर होने की जरूरत है
हम लगातर हँस रहे हैं !
हम किस पर हँस रहे हैं
क्यों हंस रहे हैं
किसी को नहीं पता
दरअसल हम खुद पर हँस रहे हैं
ऐसा लग सकता है आपको
किन्तु सच यह है कि
वक्त हम पर हँस रहा है
घटनाएं लगातर अपनी रफ़्तार से घटती जा रही हैं
रोज मारे जा रहे हैं मजबूर लोग
कोई नहीं है उन्हें बचाने के लिए
हमारे विवेक पर सत्ता हंस रही है
बरबादी और मौत के इस युद्ध काल में
हमारी आवाज़ कैद हो चुकी है
हम चीखते भी हैं तो
कोई सुन नहीं पाता !
अब तोड़ने होंगे ध्वनिरोधी शीश महल को
इस हंसी को अब थमना होगा
वरना हंसी की गूंज और तीव्र हो जाएगी

Thursday, August 10, 2017

इस नये इतिहास में हमारा स्थान कहाँ होगा

हक़ीकत की जमीन से कट कर
हमने आभासी दुनिया में बसेरा बना लिया है
हवा में दुर्गंध फैलता जा रहा है
हमने सांसों का सौदा कर लिया है
जमीन धस रही है 
और हम आसमान में उड़ना चाहते हैं
पर वो आसमान कहाँ है
जहाँ पंख फैला कर कोई परिंदा भी अब आज़ादी से उड़ सके !
हम अपनी भाषा से दूर हो गये हैं
हमने 'एप्प' नामक मास्टर से नई भाषा सीख ली है
यह भाषा जो हमारी पहचान को मिटाने में सक्षम है
आजकल हम उसी में बात करते हैं
देश की सत्ता आज़ादी का पर्व मनाने को बेचैन है

ऐसे समय में नागरिक खोज रहा है
अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार
हम बाहर की दुनिया से इस कदर कट गये हैं कि
न धूप की खबर है न ही पता है कि चांदनी कब फैली थी आखिरी बार
दूरभाष यंत्र 'फोन' से आदेश पर नमक तक घर पहुँच जाता है
हम पानी का स्वाद भूलने लगे हैं
कहने सुनने के तमाम आधुनिक उपकरणों के इस युग में
हम भूल गये हैं कि
हम कहना क्या चाहते हैं
हम संविधान के पन्ने पलट रहे हैं
गैजस्ट्स को देशी भाषा में क्या कहते हैं
मुझे नहीं पता
आपको पता हो शायद
झारखण्ड की सुदूर पहाड़ी पर बसे आदिवासियों को
नहीं मिल रहा है सरकारी राशन
हमें न इसकी खबर है न ही परवाह
हम पोस्ट करते जा रहे हैं अपनी पसंद की बातें
रंग-बिरंगी पटल पर जिन्हें खूब सराहा जा रहा है
हम 'लाइक' और टिप्पणियों (कमेंट्स ) की गिनती कर रहे हैं
एक तरफ़ा मन की बात के इस दौर में
दूसरों की आवाज़ हमारे कानों तक नहीं पहुँच पाती
हमारा जीवन-मृत्यु एक नम्बर पर निर्भर हो गया है
उसे ही जीवन का आधार कहा गया है !
घाटी -घाटी का इतिहास बदल रहा है
नये इतिहास गढ़े जा रहे हैं
इस नये इतिहास में हमारा स्थान कहाँ होगा
किसी को पता है क्या ?

Saturday, August 5, 2017

हमारी इस कमज़ोरी को क़ातिल खूब समझता है

ऐसा नहीं है कि
क़त्ल से पहले क़ातिल ने चेताया नहीं था उन्हें
यकीन न हों तो पढ़ लीजिये फिर से
रोहित वेमुला की आखिरी चिठ्ठी
और यदि याद हो 
अख़लाक़,
पहलू खान
और जुनैद का चेहरा पढ़िए
आपको पता चल जायेगा कि
क़ातिल ने क़त्ल से पहले खूब डराया था उन्हें
जैसे कभी मार दिए गये थे सुकरात
गाँधी तो मांसाहारी नहीं थे
फिर भी उनकी हत्या हुई थी खुली सड़क पे
और गाँधी वैष्णव थे !
क़ातिल वजह नहीं खोजता क़त्ल से पहले
हत्या से पहले वह आँखों में झाँक कर नहीं देखता
वह सिर्फ मारता है
काटता है
यही उसका पेशा है
वह ईमानदार है अपने पेशे के प्रति
और हम ....
न तो ईमानदार हैं अपने उसूलों के प्रति
न ही हम वफ़ादार हैं अपने वादों के प्रति
हम हर क्षण बदलते रहते हैं
अपनी जरूरतों के अनुसार
हमारी जरूरतें क्षण -क्षण बदलती है
हमारी इस कमज़ोरी को
क़ातिल खूब समझता है
और मन ही मन मुस्कुराता !

Friday, August 4, 2017

एक चिड़िया आकाश पर

अत्याचार,
शोषण -दमन
और तानाशाह के खिलाफ़
हम कविता लिख रहे हैं
नदी किनारे आखिरी वृक्ष मौन खड़ा है
एक चिड़िया आकाश पर फैले
काले धुंए से लड़ रही है !

Thursday, August 3, 2017

तुम मेरा महाकाव्य हो

मैं एक हारा हुआ व्यक्ति हूँ 
इसलिए तुम्हें खोने से डरता हूँ 
तुमने जब 
मुझे 'कवि' कह कर संबोधित किया 
मैंने खुद को तुम्हारा कवि कहा 
तुम्हें छूना चाहता हूँ
पर,
तुम्हारी नाजुकता से डरता हूँ
तुम मेरा महाकाव्य हो |


रचनाकाल : 4 अगस्त 2016 (posted on facebook )

हमसे हुआ नहीं ऐसा

वे चाहते थे कि
मैं भी उनकी भाषा में बोलूं
न बोल सकूं तो कम से कम उनकी भद्दी भाषा का समर्थन करूँ
हमसे हुआ नहीं ऐसा
हम न उनकी भाषा में बोल सकें 
न ही उनका समर्थन कर सकें
उन्हें आग लग गई
उनके पास भी गौ रक्षकों की एक पोषित भीड़ है
जो कभी भी
कहीं भी किसी भी विरोधी की हत्या कर सकती है
पीट कर न सही
अपनी भद्दी भाषा में वे किसी की हत्या करने में सक्षम हैं
मैंने अपना दरवाज़ा बंद कर दिया उनके लिए
उनके डर से नहीं
अपनी भाषा को बचाने के लिए
हम नहीं गा सकते जयगान
उन्होंने मुझे कुंठित कहा
गद्दार भी
जबकि हमने उनका नमक कभी नहीं खाया
सत्ता के कई रूप हैं
पहचानने का विवेक होना चाहिए |

Wednesday, August 2, 2017

कविता मेरी मिट्टी में छिपी हुई है

कविता कहाँ है उन्हें नहीं पता 
उन्होंने नहीं देखा खेत में किसान को
नहीं देखा उन्होंने पसीने से भीगे हुए मजदूर के बदन को
कुम्हार के चाक पर गढ़ते नये सृजन के बारे में नहीं पता उन्हें
तभी पूछा गया यह सवाल 
माँ की गोद में खिलखिलाते शिशु की हंसी को महसूस नहीं किया होगा शायद
बागों में जो फूल खिले हैं
उसमें भी नहीं मिली उन्हें कविता
पहाड़ से निकलती नदी की कल -कल में कविता को खोज नहीं पाए हैं वे
आकाश पर उड़ते पंछियों से पूछा नहीं उन्होंने आज़ादी का मतलब
नफ़रत के सौदागर कभी समझ नहीं पाए प्रेम का स्वाद
और पूछते हैं सवाल
कविता कहाँ है ?
कविता मेरी मिट्टी में छिपी हुई है
बारिश के बाद सौंधी खुशबू के साथ बाहर निकलती है
और मुझे महका देती है |

बेअसर हो गयी तमाम कविताओं को

बेअसर हो गयी तमाम कविताओं को
मैंने जला देना बेहतर समझा
शब्दों का ढेर बेजान सा कागज की छाती पर पड़ा है
लोग बेपरवाह हैं
उन्हें कोई मतलब नहीं कि पड़ोस के घर में आग लगी है 
सड़क पर कोई रक्त से भीगा पड़ा है
किसी गौ रक्षक ने भीड़ के सामने उसकी हत्या कर दी है
भीड़ ने उस हत्या की फिल्म बनाई है
बस उस भीड़ ने उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया
उसी सड़क के किनारे बड़ा सा होर्डिंग लगा है जिस पर देश के प्रधान
बहुत ही स्वच्छ और उज्ज्वल परिधान में खड़े हैं
उस होर्डिंग पर सबसे बड़ी तस्वीर भी उनकी है
और उनके पीछे एक ग्रामीण स्त्री हल्की मुस्कान लिए अपने चेहरे भर के साथ मौजूद हैं
जहाँ एक रसोई गैस का सिलेंडर है ...और लिखा है ... महिलाओं को मिला सम्मान !
'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना'
सिलेंडर से सम्मान इस बात को समझने की जरूरत है
कि सम्मान के लिए कई उपाय है सत्ता के पास
और सम्मान भी सब्सिडी के साथ !
और सब्सिडी सदा के लिए नहीं होती
माताएं खूब जानती हैं इस बात को
पर कहती नहीं
क्योंकि उनके बोलने से ही हलचल पैदा हो सकती है
इसलिए यहाँ महिलाओं को घुंघट में रहने की सलाह दी जाती है अक्सर
और यह भी बता दिया जाता है कि
'खूब लड़ी मर्दानी वो झाँसी वाली रानी थी '*
(सुभद्राकुमारी चौहान की कविता )
और भी बहुत कुछ
माने कि सम्मान जो वे अपनी इच्छा से आपको दें
उसी में संतोष रहो , इसी में मर्यादा है
यही उनका मानना है
जरूरत पड़ने पर रानी पद्मावती की कहानी भी सुनायेंगे
वे किसानों को अन्नदाता कह कर संबोधित करेंगे
और अपने हक़ के लिए सड़क पर उतरे तो गोली चलवा देंगे
वे विश्वविद्यालय में पुस्तकालय नहीं तोप लगाने की पैरवी करेंगे
ऐसा बहुत कबाड़ लिख चुका हूँ
और उन्हें कविता मानता आया हूँ
किन्तु अब लगता है केवल शब्दों का ढेर जमा किया है हमने
और अब जब चारों ओर स्वच्छता का नारा है
बापू का चश्मा भी इस अभियान का सिम्बल बना दिया गया है
और कहीं कोई असर नहीं मेरे लिखने का
ऐसे में उन्हें जला देना ही उचित होगा शायद !

Wednesday, July 19, 2017

मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप
चीख़ कर रोना चाहते हैं
किन्तु रो नहीं सकते !
कैसा लगता है तब ?
तकलीफ़ होती है न ?
मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर
जैसा कि मैं चाहता हूँ
किन्तु रो नहीं पाता हूँ
बहुत घुटता रहता हूँ
जैसे किसी तानाशाही ताकत ने
कैद कर दिया मुझे
किसी कैद खाने में
जहाँ से मेरी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती
मैं करना चाहता हूँ
दर्द और प्रेम का इज़हार एक साथ
पर मेरी आवाज़ और तुम्हारे बीच
बहुत मजबूत एक दीवार है
मेरी आवाज़ भेद नहीं पाती उसे
आओ हम मिलकर
चीखें दीवार की दोनों ओर .....

Sunday, July 2, 2017

बरसात में नदी

बरसात में कभी देखिये
नदी को नहाते हुए
उसकी ख़ुशी और उमंग को
महसूस कीजिये कभी
विस्तार लेती नदी 
जब गाती है
सागर से मिलन का गीत
दोनों पाटों को बात करते सुनिए
कि हर नदी की किस्मत में
मिलन नहीं है
फिर भी बारिश में नहाती कोई नदी
जब खुश होती है
पहाड़ खोल देता है अपनी बाहें
झूमता है जंगल
खेत खोल देता द्वार
और कहता -
ओ , नदी थोड़ा संभल कर
मुझे सर्दी लग जाएगी !
खेत, अपने उदास किसान का
चेहरा सोच कर बुबुदाता है |
कहीं दूर उस नदी किनारे पर बसा गाँव से निकल कर
कुछ बच्चों ने कागज की कश्ती बनाई है
वे उसे नदी में बहा देना चाहते हैं
उस कश्ती में बच्चों ने
अपनी ख़ुशी भर दी है
और बताया है
कि, पिछले साल उनके गाँव के किसान, चिंटू के पापा ने
सूखे के कारण अपनी जान दे दी थी
पानी के आभाव में मरी थी कई बकरियां
बच्चों ने कश्ती में सूखे की पीड़ा लिखी है |
Image result for paper boat in rain

Tuesday, June 27, 2017

हत्या के लिए कोई नया बहाना हर बार

दरअसल गाँधी की हत्या के साथ ही
उन्होंने बता दिया था
जब -जब उनका मन होगा
और जो कोई उन्हें पसंद नहीं होगा
उसी तरह सड़क पर उनकी निर्मम् हत्या कर दी जाएगी 
वे तन पर चोट देकर हत्या तो करेंगे ही
किन्तु उससे पहले वे कई बार चोट करेंगे हमारे मन पर
हमारी सोच पर
हमारी सोच से ही नफ़रत है उन्हें
जबकि ये हत्यारे ही नफ़रत के सबसे बड़े व्यापारी हैं
और उन्हें यह भली-भांति पता है कि
वे लाख कोशिशों के बाद भी मार नहीं सकते हैं हमारी सोच को
इसलिए अंत में वे हमें तन से ही मिटा देना चाहते हैं
भला भोजन के आधार पर किसी की हत्या कर दी जाएगी
ऐसा किसने सोचा था कभी
पूरी धरती पर ऐसा कहाँ -कहाँ होता है ?
यहाँ के अलावा कहीं नहीं
भोजन ही जीवन का आधार है
और अब उसी भोजन के आधार पर वे छीन रहे हैं जीवन
किन्तु यह सत्य नहीं है
हत्या के लिए इस भोजन को बस बहाना बनाया गया
दरअसल उनकी चिंता हमारी सोच से है
और किसी पशु की रक्षा के बहाने जो लोग
मार रहे हैं इंसानों को
उनके लिए क्या कहा जा सकता है भला !
पशु बोल नहीं पाते इन्सान की भाषा
पर प्रेम और नफ़रत के फ़र्क को महसूस कर सकते हैं
किन्तु उन्हें नहीं पता कि उनके नाम पर भी हत्या हो सकती है
गाँधी मांस नहीं खाते थे
शाकाहारी वैष्णव थे
उनकी हत्या हुई थी न
तो आज भोजन के आधार पर जो इंसानों को मार रहे हैं
दरअसल हत्या ही उनका पेशा है
खोज लाते हैं समय -समय पर
हत्या के लिए कोई नया बहाना हर बार

Tuesday, June 13, 2017

गवाही कौन दें

हत्या
हर बार
तलवार या बंदूक से नहीं होती
हथियारों से जिस्म का खून होता है
भावनाओं का क़त्ल फ़रेब से किया जाता है 
और पशु फ़रेबी नहीं होता
जानता है यह हक़ीकत इन्सान
फिर भी नहीं शर्माता
शर्म के लिए भी विवेक चाहिए |
धरती ,
बोलती नहीं दर्द की कथा
आकाश रहता है ख़ामोश
जिस पेड़ को हमने छुआ था
याद है उसे स्पर्श का अहसास
पर, अब
हम नहीं हैं एक साथ
गवाही कौन दें
कि बेवफ़ा कौन है ?

Monday, June 12, 2017

तुम्हारे पक्ष में ........


हाँ यही गुनाह है
कि मैं खड़ा हूँ तुम्हारे पक्ष में
यह गुनाह राजद्रोह से कम तो नही 
यह उचित नही
कि कोई खड़ा हो
उन हाथों के साथ जिनकी पकड़ में
कुदाल ,संभल , हथौड़ी ,छेनी हो
खुली आँखों से गिन सकते जिनकी हड्डियां हम
जो तर है पसीने से
पर नही तैयार झुकने को
वे जो करते हैं
क्रांति और विद्रोह की बात
उनके पक्ष में खड़ा होना
सबसे बड़ा जुर्म है ....
और मैंने पूरी चेतना में
किया है यह जुर्म बार -बार ..

रचनाकाल :12 जून , 2013 

Thursday, June 8, 2017

राजा निपुण शिकारी है

राजा संविधान कभी नहीं पढ़ता
वैसे राजा संविधान लिखता भी नहीं
इसलिए वह संविधान की परवाह नहीं करता
राजा का आदेश ही
राजा का संविधान है
जिसे प्रजा पर हर हाल में थोप दिया जाता है
क्यों कि राजा का मानना है कि
उसकी भलाई में ही
प्रजा की भलाई है
राजा आखिर सिर्फ राजा नहीं होता
इतिहास कहता है राजा धरती पर देवता का प्रतिनिधि है
और ये इतिहास किसने कब लिखा
किसी को नहीं पता
किसी देवता ने किसी मनु को राजा बना दिया था
ऐसी अफ़वाह खूब फैलायी गयी यहाँ
वर्षों पहले क्टेवियन ने जूलियस सीज़र के सभी संतानों को मार दिया था
राजाओं को प्रिय है आक्रमण और हत्याओं की कहानी
राजाओं का प्रिय शौक है शिकार खेलना
प्राचीन राजा जंगल में शिकार खेलते थे
आधुनिक राजा के साम्राज्य में जंगल नहीं बचे हैं
इसलिए राजा अब शहरों, नगरों, कस्बों और गांवों में घुस कर शिकार खेलता है
वह शहर,
नगर,
गाँव को जंगल बना देना चाहता है |
राजा निपुण शिकारी है
और प्रजा आधुनिक जंगल के निवासी !

Monday, June 5, 2017

प्रेम क्रांति का पहला पड़ाव है

इस दौर में
कवियों से अधिक हमले
प्रेमियों पर हुए हैं
तभी तो ,
कवियों से अधिक 
प्रेमी शहीद हुए हैं
सत्ता डरती है
प्रेमियों से
लिखी गयी कविता अब मोड़ कर रख दी जाती है
कवि पुरस्कार लेकर खुश हो जाता है
तारीफ़ कवि की सबसे बड़ी कमजोरी है
जबकि प्रेम ऐसा कुछ नहीं चाहता
प्रेमी विद्रोह करता है
सबसे पहले
वह अपनों का विरोध करता है
जो प्रेम के विरोध में होते हैं
इसी तरह परिवार से समाज तक
और समाज से
सत्ता तक पहुँचता है उसका विरोध
सत्ता, जो एंटी रोमियो दल बनाती है
इसलिए ,
प्रेम क्रांति का पहला पड़ाव है
और मैं इस क्रांति के पहले पड़ाव पर हूँ !

Sunday, June 4, 2017

न ही मैं, खुद को समझा पाया हूँ ..

और हो सकता है
कि,
किसी सुबह
 तुमसे मुलाकात ही
न हों !
मैंने दुनिया को
सोचना छोड़ दिया है
जबकि,
मैं जानता हूँ
कि यह, वही दुनिया है
जहाँ से निकल कर
मैं लेना चाहता हूँ साँस !
न तुमने समझा मुझे
न ही
मैं, खुद को समझा पाया हूँ ....
तुम्हारे गुड नाईट
कहने के बाद के समय को
मैं सोचता हूँ ...
तुम समझ नहीं सकी हो मुझे
मैं,
अपनी तमाम रातें
तुम्हारे नाम करता हूँ |

Tuesday, May 30, 2017

मैं बेवफ़ा हूँ और तुम मासूम

पता नहीं क्यों
तुम्हारे तय रास्तों पर
मंजिल तक पहुँच न सका
मेरा प्रेम !
अब मैं
बेवफ़ा हूँ
और तुम मासूम |

रेत नहीं बहते पानी हैं

हो सकता है 
अब हम आपकी 
आँख की 
किरकिरी बन गये हैं 
जबकि हम रेत नहीं 
बहते पानी हैं !

किसान बोलता नहीं शोषण की कहानी

किसान बोलता नहीं
शोषण की कहानी
कर लेता है ख़ुदकुशी
आदिवासी बोलते हैं 
लड़ते हैं अपनी जमीन -जंगल के लिए
पुलिस मार देती है गोली
छात्र उठाये आवाज़ अपने हक़ के लिए
तो,भर दिए जाते हैं जेल |
लोकतंत्र की किताब में
ये नये अध्याय हैं !
इन नये लिखे अध्यायों को बदलने के लिए
लड़ना तो होगा |

हिंसा नहीं , बल्कि प्रेम का विस्तार हो

यहाँ हर अपराध को घृणित और निंदनीय
कह कर हम सब
अपने सामाजिक कर्तव्य से छुटकारा पा लेते हैं
न तो अपराध के कारणों की तलाश करते हैं
न ही भविष्य में उसके रोकथाम पर सोचने का वक्त निकाल पाते हैं 
दरअसल हमने कभी अपने किसी भी दायित्व को ठीक से जाना -समझा नहीं
मैं यहाँ आपको नैतिकता या सामाजिक दायित्व पर
कोई ज्ञान नहीं दे रहा हूँ
क्यों कि उसके लिए जो ज्ञान और समझ चाहिए
वह मेरे पास नहीं है अभी
मैं चाहता हूँ बस थम जाए पतन इंसानी समाज का
और मनुष्य सचमुच का मनुष्य बन जाये
विकास के लिए शोषण की अनिवार्यता समाप्त हो जाये
हिंसा नहीं , बल्कि प्रेम का विस्तार हो |
पर सवाल है कि
ये सब कैसे हों
कौन करे पहल ?
इन सवालों का जवाब कहीं और से नहीं
खुद से लेना होगा सबको |

Thursday, May 18, 2017

हर बेवक्त और गैरज़रूरी मौत को देशहित में जोड़ दिया जायेगा !

मनपसंद सरकार पाने के बाद
जिस तरह चढ़ता है सेंसेक्स
ठीक उसी दर बढ़ रही हैं
हत्याएं इस मुल्क में !
यह आधुनिक विज्ञान का युग है
जब हम टीवी पर
शौच के बाद साबुन से हाथ धोना सीख रहे हैं
जब, धार्मिक उन्माद और सांप्रदायिकता
अपने शिखर पर हैं
टीवी पर शांति के उपदेश दिए जा रहे हैं !
मुल्क को बुखार है शायद
नदी में डुबकी लगाकर
सब पाप मुक्त हो रहे हैं
जब राजा ने खुद को फ़क़ीर कह दिया तो
प्रजा के लिए बचा क्या है ?
फैसले की ज़िम्मेदारी
उन्माद , बेकाबू भीड़ को सौंप दी गयी है
सत्ता का निर्देश है
सवाल न करें
अब हर बेवक्त और गैरज़रूरी मौत को
देशहित में जोड़ दिया जायेगा !

मुझे कौन बचाएगा इन अपराधों से ?

अपराधों की सूची बना ली गयी है
सवाल करना अपराध है
प्रेम उससे बड़ा अपराध
गरीबी सबसे क्रूर अपराध
हक़ मांगना तो सबसे कठोर अपराध है
आदिवासी, मुसलमान होना उससे भी गंभीर अपराध इस समय देश में
गाय के पास से गुजर जाओ तो
ध्यान रहे कि
उसकी गंध भी न भटके तुममें
ऐसा होने पर सज़ा ए मौत हो सकती है अब
चुपचाप पड़े रहो
सत्ता के निर्णय को किस्मत मान लो
इसी में जिन्दगी का सार है
और मेरा
मन है कि
सवाल पूछने
विद्रोह करने पर उतारू है
मुझे कौन बचाएगा इन अपराधों से ?

Monday, May 15, 2017

मौत से वफ़ा सीखने का वक्त है

धरती ने क्या चाहा
नहीं पता आकाश को
किसान को पता था
और किसान मर गया
एकदिन भूख से
सागर की चाहत
चाँद को पता थी
नदी का मार्ग किसे पता था !
रिश्तों की नींव हिल रही है
अविश्वास और औपचारिकता के दायरे में
यह वक्त
संदेहमुक्त होने का वक्त है
यह खुद को पहचानने का वक्त है
जिन्दगी जब भरोसा नहीं करती खुद पर
मौत से वफ़ा सीखने का वक्त है

Saturday, May 13, 2017

समेट लो कुछ रेत वक्त नापने के लिए !

लगता है कविता से दूर हो गया हूँ
जैसे तुम से बिछड़ गया हूँ
बहोत फ़िक्र थी तुम्हें , मेरी
ऐसा मुझे भी लगा था
मेरी आँखें क्यों भीग जाती हैं
 सूखे के मौसम में !
इस रहस्य का पता
केवल तुम्हारे पास है
और तुम
कोई पहाड़ नहीं
मैंने सोचा था मैदान हो
मैं नदी बन कुछ विस्तार चाहता था
अपने अस्तित्व का
पता चला हृदय से मरुस्थल हो
मर गयी नदी
समेट लो कुछ रेत
वक्त नापने के लिए !

मुझे तुमने कवि माना चुपके से !

मेरी नींद उड़ गयी !
क्यों ?
पड़ोसी मुल्क में एक धमाका हुआ
25 मरे
कश्मीर में पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने
गोलीबारी की
एक माँ शहीद हो गयी
एक माँ के बेटे के साथ
मुल्क के भीतर मारा गया
एक नागरिक
उसकी थाली पर
सत्ता की नज़र थी
इक इबादतगाह पर हमला किया
एक धार्मिक संगठन की सेना ने
एक प्रेमी जोड़े को
मौत की सज़ा सुना दी गयी
प्रेम के जुर्म में
किसानों के एक समूह ने
आत्महत्या कर ली
क़र्ज़ के बोझ से
मैंने प्रेम किया नि:स्वार्थ
और असफल हुआ प्रेम में
मेरी कविता शमशान
या किसी कब्रिस्तान में पढ़ी गयी
मेरी मौत के बाद
मुझे तुमने कवि माना
चुपके से!

नदी / मेरी आँखें

नदी ने राह मांगी 
मैंने अपनी आँखें बिछा दी

Tuesday, May 9, 2017

मैंने पीठ दिखाना नहीं सीखा अब तक

मेरी हत्या की सारी तैयारी हो चुकी है
हत्या के बाद
न मेरी लाश मिलेगी
न ही मेरी हड्डियाँ
मेरी हत्या की तैयारी
बोलने वाले
चील, कौओं और गीदड़ों ने की है
इस बार
वे न तो मुझे दफनायेंगे
न ही जलाएंगे मेरी लाश को
और मैं हूँ
कि उनकी इस साजिश को समझते हुए भी
निहत्था खड़ा हूँ तुम्हारे पक्ष में
बात तुम्हारी मुक्ति तक सीमित नहीं है
मेरी लड़ाई
तुम्हारे सुखद और सुरक्षित भविष्य की भी है
और मैं जानता हूँ
कि वे कुछ नहीं बिगाड़ सकते मेरा
मेरी विजय से पहले |
बात दुश्मनों की तो समझ सकता हूँ
पर तुम कैसे शामिल हो गये उनके पक्ष में
मेरी हत्या की साजिश में ?
जबकि तुम्हें पता है
कि मेरे जाने के बाद भी यह सवाल
करता रहेगा तुम्हारा पीछा
लड़ाई में हार दुश्मनों से नहीं होती हर बार
कुछ अपने भी हरा दिया करते हैं कभी -कभी |
मैं बार-बार याद कर रहा हूँ
आज़ादी की इस संघर्ष में
साथ देने का तुम्हारे वादे को
और मैंने दिया था भरोसा
कि निराश नहीं करूँगा तुम्हें आखिरी साँस तक
फिर कैसे बदल गया ये मौसम अचानक !
कैसे हुआ यह सब
कि तुम भी खड़े हो गए मेरे विरुद्ध मेरे दोस्त ?
बहुत मासूम हो तुम साथी
कि समझ नहीं पाये उनकी चाल
चलो, तुम साथ न सही
तुम्हारे उस झूठे वादे को साथ मानकर
लडूंगा
मैंने पीठ दिखाना नहीं सीखा है अब तक |

Friday, May 5, 2017

यह वक्त बोलने का है

यह वक्त बोलने का है
चीखने और लड़ने का है
ऐसे समय में
तुम्हारी ख़ामोशी से
भयभीत हूँ मैं
तुम बोलो
या न बोलो
तुम्हारे पक्ष में
मैं आवाज़ उठाता रहूँगा
तुम्हारे हक़ के पक्ष में
पर अब तुमसे
कुछ बोलने की अपील नहीं करूँगा
तुम लेना अपना निर्णय
अपने समय से
मेरा संघर्ष जारी रहेगा
साँस के टूटने तक |

आज तुम, मुझे अपने सपने में देखना

जब तक
मैं लौटा,
गहरी नींद आ चुकी थी तुम्हें
जंगली फूल की महक से
भर गया था मेरा कमरा !
तुम्हारी नींद में
कोई ख़लल न पड़े
इसलिए
बड़ी सावधानी से प्रवेश किया
तुम्हारे स्वप्नों की दुनिया में
आज तुम,
मुझे अपने
सपने में देखना |

Wednesday, April 26, 2017

नि:शब्द है हमारा दर्द

नि:शब्द है 
हमारा दर्द 
आओ,
आँखों से साझा करें इसे 
हम, एक -दूजे से

कभी न माँगना मेरा अकेलापन

मैं एक यायावर हूँ
ठहराव नहीं,
राह चाहिए |
फिर भी 
कभी भूले से
यदि पहुँच जाऊं 
तुम्हारे शहर
तो मांग कर देखना कुछ
दे जाऊंगा सब कुछ |
केवल मुझसे
कभी न माँगना
मेरा अकेलापन,
मेरी उदासी
मैं  दे न सकूँगा |
-तुम्हारा कवि
तुम्हारे लिए
26 अप्रैल 2016

Monday, April 17, 2017

यहाँ बिना लड़े नहीं मिलता जीने का अधिकार

ठीक इस वक्त
जब मैं,
और आप
अपने -अपने कमरे में
बैठे हुए अखबारों की सुर्खियाँ चाट रहे हैं 
गाँव में मगरू और गोबरधन
फटी धरती पर खड़े होकर
रूठे हुए आकाश को ताक रहे हैं
उनके ठीक बगल में
शरत बाबू का 'महेश'
उदास खड़ा है
गफूर की नन्ही अमीना
गयी है कहीं दूर
पानी की खोज में
इधर दिल्ली के निज़ाम ने
अपने नये सूट के माप के लिए
टेलर मास्टर को राजभवन आने का आदेश दिया है
तुम अपने वातानुकूलित शयनकक्ष में अंगड़ाई लेके फिर से सो गये
मैं पसीने में तर
तुम्हारे नमक का हक अदा कर रहा हूँ
यदि किसी दिन हाथ आ गया सूरज
उसे निचोड़ दूंगा
मैं,
मगरू और गोबरधन के गाँव जा रहा हूँ
वहां महेश से कहूँगा
भारत में रहना हो तो
गफूर को अपना मालिक मत बनाना फिर कभी
और अमीना से कहूँगा
कि जीना है तो
अपना नाम बदल ले
या उठा ले क्रांति मशाल हाथों में
यहाँ बिना लड़े नहीं मिलता जीने का अधिकार
आज़ादी का आना अभी बाकी है साथी |

Friday, April 14, 2017

जनकवि रोता है

अपराध की बड़ी घटनाएं
जब सिमट जाती हैं
अखबारों के भीतरी पेज के किसी छोटे से कोने में
और जब लोगों की रूचि बदल जाती है
व्हाट्स एप चैट पर 
ऐसे में संवेदनाएं डिजिटल होकर
बह जाती हैं
बारिश के पानी की तरह
प्रेम डूब जाता है
बाढ़ में खेतों की तरह
सत्ता ठहाका लगाती है
अपनी जीत पर
किसान फांसी लगाता है
अंधकार अपने साम्राज्य का विस्तार करता है
भांड लीन हो जाते हैं जयगान में
माँ मजबूर हो जाती है
भूख से तड़पते अपने बच्चे के लिए
प्रेमियों को सुना दी जाती है
सज़ा-ए-मौत
अंधकार कोने में
जनकवि रोता है
कि उसका लिखा कुछ काम न आया !

Thursday, April 13, 2017

मेरी प्रेम कहानी तस्वीरों में कैद है

यह लोकतंत्र का वो दौर है मेरे देश में
जब योग सिखाने वाले
व्यापारी को दी जाती है
जनता की कमाई से
सरकारी सुरक्षा 
सत्ता की तारीफ़ करने वाले पत्रकार भी
पा जाते हैं सुरक्षा गार्ड !
सत्ता की जीत पर लडडू  बाँटते पत्रकार
हमने देखे हैं
जबकि पत्रकार को हमेशा
सत्ता के विपक्ष में होना चाहिए !
यहाँ प्रेमियों पर पहरा देने
उन्हें पीटने के लिए
बहुत दल गठित हैं अब
किन्तु
प्रेम की रक्षा के लिए
कोई नहीं है
मैं खबरों से निकल कर
तस्वीर देख रहा हूँ
जिनमें तुम
मेरे कंधे पर सर रख कर
मुस्कुरा रही हो !
मेरी प्रेम कहानी
तस्वीरों में कैद है !

Monday, April 10, 2017

अपना अधिकार मांग के देखिये

अपराधी बनने के लिए
अपराध करने की जरूरत नहीं
केवल सत्ता से
कोई सवाल कर लीजिये
मैंने तो इससे भी बहुत कम कुछ किया
तुमसे प्रेम किया
और अपराधी घोषित हो गया
अच्छा चलिए
आप न सवाल करिए
न ही प्रेम कीजिये
आप केवल अपनी जमीन
अपना अधिकार मांग के देखिये
आपको पता चल जायेगा
अपराधी कैसे बना दिए जाते हैं
लोकतंत्र में
चलो छोड़ो इन बातों को
आप खुद को मुसलमान बता कर
एक गाय खरीद लीजिये
अखबारों के मुख्य पेज पर
आपकी मौत की खबर छप जाएगी अगले दिन
- मैं, वही
तुम्हारा कवि

Saturday, April 8, 2017

मेरी माँ कोई गाय नहीं है

मैं कवि हूँ
और अब ख़बरें लिखता हूँ
जबकि उन ख़बरों में
मैं होता नहीं हूँ
क्योंकि कवि 
कविता में होता है
और कविताएँ अब
बची नहीं हैं मुझमें
क्यों कि अब
मुझमें बचा नहीं है
प्रेम !
रोज- रोज हत्याएं
सत्ता की खुली छूट
मेरी आँखों का पानी सूखने लगा है
अब शायद बह निकले लहू मेरी आँखों से
गरीब अपना घर छुड़ाना चाहता है
पर उसे देना होगा
गाय की भलाई के लिए टैक्स
टैक्स के रूप में जिन्दगी भी ले सकती है सत्ता
गरीब को मरना होगा
गौ-माता की जिन्दगी के लिए
यह राजकीय आदेश है
सुनो, सत्ता !
मेरी माँ कोई गाय नहीं है
मेरी माँ इन्सान है
और उन्होंने मुझे
इंसानों के लिए मरने की सीख दी है |




Wednesday, April 5, 2017

इंसानी लाशों पर महानता की कहानियां

महान सम्राटों और साम्राज्यों की
महानता की कहानियां
लिखी गयी हैं
लाखों -करोड़ों इंसानी लाशों पर
इतिहास में दर्ज़ तमाम महानताओं की बुनियाद में 
करोड़ों इंसानी लाशें दबी हुई है
आतंक और अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए
पहले राजा छोड़ देता था
अपने एक बेलगाम घोड़े को
अवैध रूप से जहाँ तक
चला जाता था घोड़ा
वहां तक फैल जाता था राजा का साम्राज्य
या फिर
राजा करता था
कलिंग जैसे किसी शांतिप्रिय राज्य पर
अवैध चढ़ाई |
अश्वमेध के लिए अब
घोड़े नहीं बचे हैं राजा के पास
राजा के पास अब
केवल गौशालायें हैं !

Saturday, April 1, 2017

शरत बाबु लौट आइये अमीना , गफ़ूर और महेश आपसे सवाल करना चाहते हैं

ओ आमीना के अब्बा
ग़फ़ूर भाई
अच्छा किया तुमने कि
अब तुम उन कट्टर खोखले ब्राह्मणों के गांव में
नहीं रहते 
शरत बाबु ने बहुत अच्छा किया था
कि , तुम्हारे गांव छोड़ने से पहले ही
महेश को तुम्हारे हाथों मरवा दिया था
ब्राह्मणों को तो यही लगा था कि
तुमने एक बैल की निर्मम हत्या की थी
पर सच तो यह था कि
तुमने ब्राह्मणों की गालियों से मरने से
महेश को बचाया था
मुझे तो नन्ही आमीना की आँखों में
अब दिख जाता है
खेलता -मुस्कुराता महेश
आमीना उसे भात का माड़ पिला देती आज भी
पर ग़फ़ूर की झोपड़ी में अनाज का एक दाना नहीं बचा है
आज देश आज़ाद है
दस्तावेज पर तो यही लिखा है
और आजादी के बाद ख़त्म होगी भुखमरी ,
भेदभाव,
और मिलेगा न्याय और अधिकार बिना भेदभाव !
पर ऐसा हो नहीं सका |
शरत बाबु लौट आइये
अमीना , गफ़ूर और महेश
आपसे सवाल करना चाहते हैं।
 ----
मैं ,
आपका एक पाठक
नित्यानंद गायेन

Thursday, March 30, 2017

समय रहते चुनिए अपना पक्ष

जहाँ प्रेम पर पहरा हो
जहाँ एक पशु
मनुष्य से ऊपर हो जाये
उस पशु के शुद्ध गोबर से बने
उपले (गोईठा) 
हवन के लिए बिकने लगे ऑनलाइन
ऐसे समाज में जहाँ
जनहित में जहाँ सत्ता से सवाल करना हो
सबसे बड़ा अपराध
मानवीय मूल्यों की बात करना
खतरनाक है
पर,
मुक्तिबोध कह गये हैं
अब 'गढ़ और मठ तोड़ने होंगे ।'
कौन बनेगा अपराधी
मुक्तिबोध के कथन का पालन करने को
कौन है तैयार ?
अब, जब राजा ही देश है
और राजा की नीतियों की आलोचना
देशद्रोह का अपराध है
तब हम संविधान की दुहाई देते हुए
खामोश हो जाते हैं
राजा देवता का प्रतिनिधि होता है
इस कथन को याद करने के लिए
हमें यूनान या प्राचीन रोमन साम्राज्य में जाने की आवश्यकता नहीं है ।
केवल समय रहते चुनिए अपना पक्ष
अपने भविष्य के लिए ।

Monday, March 27, 2017

मैं, ज़िद में नहीं लिखता कविता

मैं,
ज़िद में नहीं लिखता कविता
न ही शौकिया लिखता हूँ
मैं तो कविता जीता हूँ
बेचैन होता हूँ
जिस तरह प्रेम
शौकिया नहीं होता
ज़िद से प्रेम हासिल नहीं होता
ठीक उस तरह
मैंने कविताएँ लिखी नहीं
लिख गयी हैं
जैसे हुआ था
तुमसे प्रेम मुझे
दरअसल साहित्य के विद्यार्थी समझ नहीं पाते
प्रेम कविता
विद्यार्थी डिग्री के लिए साहित्य पढ़ते हैं
मैं कविता लिखता हूँ
दर्द और प्रेम की अभिव्यक्ति के पक्ष में
कम से कम
मैं रहूँ
या न रहूँ
मेरी कविताओं में
बचा रहे मेरा प्रेम
विरह की पीड़ा
और तुम्हारी बेवफ़ाई
ताकि बची रहे
हमारी प्रेम कहानी सदियों तक !

Saturday, March 25, 2017

मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है

मैं, तुमसे बिछुड़ने से डरता था
तुमने कभी महसूस नहीं किया था
मेरे इस डर को

मैंने कहा था तुमसे
कभी तुम सागर बन जाओ 
मैं, नदी बन
तुमसे मिलने आऊंगा

ऐसा हुआ नहीं
पर तुमने एक नदी
मेरी आँखों में भर दी
मुझे तनहा छोड़ कर
आज मैं
एक मरुस्थल हूँ
मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है
और मरी आँखें नम हैं
आना कभी मन हो तो
मैं इंतज़ार करूँगा....





Friday, March 24, 2017

योगी सत्ता में

एक योगी
टीवी पर योग सिखाते -सिखाते
अब टीवी पर
साबुन ,
तेल,
नून, दातुन पेस्ट
और घी आदि बेचने लगा है
हाँ, वही
जो सलवार-शूट पहिनकर भागा था
बिलकुल वही
जिसने टीवी पत्रकार से कहा था
जब वो मूतने जाता है तो
दो हजार लोगों की भीड़ जमा हो जाती है
हाँ, वही
जिसने कहा था
कि कानून का डर है
वर्ना कईयों की लाशें बिछा देता !
एक संत बना बैठा बलात्कारी
उसकी आसा
जेल में निराशा में बदल गयी
और अब एक
प्रेमियों पर कड़ी पहरा बैठा कर
खूब मजे ले रहा है
गाजीपुर के मुर्गी व्यापारी सहमे हुए हैं
मुर्गियां बिकना नहीं चाहती
काशिम मुल्ला का परिवार
भुखमरी के द्वार पर खड़ा है
दिन में एक बालिका बता गयी
कि कौटिल्य साधू था
मुझे लगा था
कि वो तक्षशिला विश्वविद्यालय में
राजनीति का प्राचार्य था
पर जब कोई भक्त कुछ नया कहें
तो मान लेना बेहतर
मेरे बहुत दोस्त हैं
ऐसा मैं भी मानता था
साधुओं की तरह
उनके चेहरे भी रोज खुल रहे हैं
मैं समझदार हो रहा हूँ
उनके चेहरे की रौनक से
मतलब मेरा भ्रम टूट रहा है
उन्हें भी पता चल गया है

Thursday, March 23, 2017

इस देश में प्रेम निरोधक दस्ते

सागर ने कहा नहीं
नदी से अपनी बेचैनी
देखने वालों ने
लहरों को टूटते देखा
तट पर 
नदी ने कही नही
विरह की पीड़ा
बहती रही लगातर
बांध बना कर रोक दिया
नदी की प्रवाह को
मुझे तुमसे मिलने नहीं दिया
अपने ही लोगों ने
यह मेरी -तुम्हारी कहानी है
कोई क्या समझेगा
प्रेमियों की व्यथा
प्रेम अपराध है उनके लिए
क्यों कि
वे खुद वंचित हैं
प्रेम से ..
अब इस देश में
प्रेम निरोधक दस्ते बनने लगे हैं
चलो हम मिलेंगे ऐसी जगह पर
जहाँ चाँद को भी रहेगा इंतज़ार
हमारे मिलन का |

तुमसे बिछड़ गया मैं

इस बार घर से लौटते हुए 
ट्रेन रुकी दुर्गापुर स्टेशन के
उसी प्लेटफार्म पर
जिस पर मैंने उस दिन
तुम्हारे आने का 
इंतज़ार किया था
आज,
मैं अकेला हूँ
सफ़र में !
ख्यालों का 
भविष्य नहीं होता
मैंने तुम्हें अपना भविष्य माना था
ख्याल टूटे
मिलकर तुमसे 
बिछड़ गया मैं
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Tuesday, March 7, 2017

बहुत बेपरवाह हूँ मैं

रात का सन्नाटा
पसर रहा है
मेरी हड्डियों में
बालकनी में खड़ा होकर 
बहुत देर तक देखता रहा
रात के आकाश को
दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं
तुम्हारी नाक की नथ की तरह
मुझसे उब कर
विदा लेने के कारण को
खोज लिया है मैंने
बहुत बेपरवाह हूँ मैं |
----------------------
तुम्हारा कवि सीरिज से

निर्णायक समय पर पक्ष का साफ़ होना जरुरी है

पुरस्कार, चर्चा और नाम के लिए
जीने -मरने वाले
लोगों को
पहचानते हैं आप ?
वो उधर भी हैं
इधर भी !
मतलब
वे, वक्त के हिसाब से
बदलते हैं अपना रंग |
वे खूब जानते हैं
गलत -सही
सच -झूठ
पर अच्छे बने रहना चाहते हैं
दोनों ओर
ऐसे लोगों का पक्ष निर्धारित नहीं
और मुझे लगता है
निर्णायक समय पर
पक्ष का साफ़ होना जरुरी है
वो,
जो दोनों ओर है समान रूप में
वो मेरी ओर नहीं है
उनकी चाल मैं समझ चुका हूँ |

मेरी/ तुम्हारी प्रेम कहानी

तुम्हें भुलाने को
सोने की कोशिश
बहुत की
पर रात ने जिद्द नहीं छोड़ी
और मेरी आँखों ने 
रात का पक्ष लिया
#मेरी/ तुम्हारी प्रेम कहानी

मेरे मेरे दामन पर लगे हैं

तुम्हारे छोड़े हुए टूथब्रश से
मैं अपने कत्थई दांत
साफ़ करने की कोशिश
करता हूँ हर सुबह
दाग मेरे दांत से गहरा
मेरे दामन पर लगे हैं
मैं,भावुक होकर लिखता रहा
तुम्हारा कवि!
पिट गया
मैं लूट गया
एक तरफ़ा इश्क़ में !

Sunday, March 5, 2017

दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं

रात का सन्नाटा
पसर रहा है
मेरी हड्डियों में
बालकनी में खड़ा होकर 
बहुत देर तक देखता रहा
रात के आकाश को
दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं
तुम्हारी नाक की नथ की तरह
मुझसे उब कर
विदा लेने के कारण को
खोज लिया है मैंने
बहुत बेपरवाह हूँ मैं |
----------------------
तुम्हारा कवि सीरिज से

Saturday, March 4, 2017

मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ

हत्या
बहुत मामूली बात हो गयी है
मेरे देश में
मेरे कान
यंत्रणापूर्ण चीखों से भर गये हैं
वो चीखें अब
नदी बन
सैलाब लिए
मेरी आँखों से बाहर आने को
बेताब हैं
मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ
रात भर |
काश, मुझे इस वक्त
सर टिकाने को
मिल जाता
तुम्हारा कंधा
-तुम्हारा कवि सीरिज से


Tuesday, February 28, 2017

अमन के पक्षधर हैं जो

गाँधी शांति के पक्षधर थे
एक उग्र राष्ट्रवादी ने उनकी हत्या कर दी
क्या हुआ था महान मार्टिन लूथर किंग के साथ
याद कीजिये जरा 
4 अप्रैल 1968 को
जब वे अपने होटल के कमरे की बालकनी में खड़े थे ?
उनको भी मार दी गयी थी गोली
आज़ादी के पक्ष जिनका कोई योगदान नहीं
वे केवल हत्या करना जानते हैं
गुरमेहर भी युद्ध के पक्ष में नहीं है
उसने अमन की वकालत की है
उसे भी डरा रहे हैं
आज के नव राष्ट्रवादी !
अमन के पक्षधर डरते नहीं
युद्ध मानवता के पक्ष में नहीं
विनाश का पर्याय है
हर युद्ध
आखिरकार दो महायुद्धों के बाद भी
तमाम शक्तियों को
शांति वार्ता के लिए आना पड़ा था
एक टेबल पर |
किन्तु,
वो याद किसे है ?
युद्धोन्माद अँधा बना देता है
अक्ल से |

Monday, February 27, 2017

बदनामी से डर किसे है

कर्ज़ कुछ बाकी हैं
अभी ज़िंदगी के
वर्ना
अब तक
रुख़सत ले चुकी होती ज़िंदगी
बदनामी से डर किसे है
इश्क़ से खौफ़ लगता है
दुश्मन से नही
अब दोस्त से डर लगता है |

Saturday, February 25, 2017

इस अनजान दुनिया में

अभी -अभी लौटा हूँ
ऑफिस से
रास्ते में ऑटो वाले भैया ने
खैनी बना कर दिया
उन्हें लगा 
मैं भी बिहारी हूँ
वे मोतिहारी के थे |
कितना अच्छा लगता है
जब कोई अनजान
पहली बारी में आपको
अपना समझने लगे
उन्होंने मुझे
मेरी भाषा से पहचाना
मतलब उन्हें बिलकुल पता न चला
कि मैं ,
बिहारी नहीं
बंगाली हूँ |
ऐसे में आप ही बताइए
मैं कैसे कहता उनसे कि
मैं, बिहारी नहीं
बंगाली हूँ
हिंदी में लिखता हूँ !
मेरी भाषा ने
मुझे एक अनजान से दोस्ती करवाई
भाषा उधार की नहीं होती
भाषा,
केवल भाषा होती है
एक पहचान की
जिससे हम खोज लेते हैं
इस अनजान दुनिया में
किसी बिछड़े हुए
अपने को |

तुम्हारा कवि

1.
कब तक लगाते रहोगे
अपनी तस्वीर दीवार पर ?
कभी आईना से भी
कुछ पूछ लेते 
तो अच्छा होता
-तुम्हारा कवि

2.
तुम्हारे संघर्ष की कहानी में
छिपी हुई है
मेरी नई कविता
करीब आओ तो
पढ़ सकता हूँ उसे 
मैं तुम्हारी आखों में।

Thursday, February 23, 2017

घटनाएं निंदनीय नहीं होती

घटनाएं
निंदनीय नहीं होती
न ही दुखद होती हैं
क्योंकि निंदा या अफ़सोस से
घटनाएं बदल नहीं जाती
घटनाएं घटने के लिए होती हैं
पर घटती नहीं
बढ़ती जाती है
समय और विकास के साथ
जो कुछ होता है
घटनाओं में लिप्त
मनुष्य का होता है
करने वाला भी
और भोगने वाला भी वही
हाँ,कुछ घटनायें
भयानक होती है
आज की तरह |

Wednesday, February 22, 2017

मेरा होकर बहुत तनहा रह गया है

दिन भर की तमाम
अराजक घटनाओं को झेल कर
खुद को भरोसा देता था
कमरे पर लौट कर
तुमसे लिपट कर रो सकता हूँ मैं 
तुमने मुझसे विदा मांग ली
और मैं अनाथ हो गया उस दिन
अक्सर अब
कमरे में लौट कर
देखता हूँ बुद्ध की उस तस्वीर को
जिसे तुम्हारी पसंद से
हम साथ खरीद लाये थे
अपने 10 / 12 के कमरे की
खाली दीवार के लिए
बुद्ध की वो तस्वीर
आज भी टंगी हुई है 
मेरे कमरे की दीवार पर
बस अब यह कमरा
हमारा से
मेरा होकर
बहुत तनहा रह गया है

दिन भर जूझता है
अपने अकेलेपन से
मेरी तरह
तुम बताओ
खुश तो हो न
अपने भरे -पूरे घर में
इनदिनों
मुझसे आज़ादी के बाद ?
इस कमरे में
उन 30 दिनों की
यादों के सिवा
कुछ भी नहीं बचा है
मेरे पास |
#तुम्हारा कवि सीरिज से

Monday, February 20, 2017

उसे पहचानों

वो कौन है
जो हमारी इज़ाजत के बिना
हमारे हक़ में
फैसला लेने का दावा करता है?

वो कौन है
जिसका हाथ रंगा हुआ है
इंसानी खून से
और हमारी रक्षा की बात करता है ?

हम क्यों हैं ख़ामोश
अपने ही लोगों की चीखें सुन कर
वो कौन है
उसे पहचानों
जो दोषी है
हमारी तकलीफ़ों के लिए 

Sunday, February 19, 2017

अब जुदा होके

1.
प्रेम में रहते हुए
कभी लिख नहीं पाया
प्रेम कविता
अब जुदा होके
रोना चाहता हूँ 
और निकल आती है
कविताएँ
अब अक्सर
उभर आती है बनारस की गंगा
मेरी आँखों में
जिसे मैंने देखा था शांत बहते हुए
तुम्हारी आँखों में
तुमसे लिपट कर रोना चाहता हूँ
और तुम .....
उफ्फ ....

2.

तुमने मुझे भूला दिया
यह पता है मुझे
मैं तुम्हें
याद नहीं करता
तुम्हें भूला नहीं हूँ 
भूलूँगा नहीं
आखिरी साँस के बाद भी
कवि हूँ तुम्हारा
तुमसे प्यार किया
मैंने !
-तुम्हारा कवि सीरिज से

Tuesday, February 14, 2017

ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग

अंग्रेजी कैलेंडर में दर्ज़
'प्रेम दिवस'
भी आज निकल ही गया
जैसे निकल जाता है रोज के दिन
पर कुछ दिन सच में खास होते हैं
या बना दिए जाते हैं
मुझे बहुत ख़ुशी होती है
जब दुनिया में प्रेम की बातें होती हैं
वर्ना रोज -रोज नफ़रत और जंग की बातों ने
जीवन को नरक जैसा बना दिया है
वैसे मैंने न तो स्वर्ग देखा है
न ही नरक
जो कुछ देखा इस धरा पर देखा है
धरती खुबसूरत है
पर प्यार करने वालों ने इसे और भी खुबसूरत बना दिया है
मैंने आज
नहीं लिखी कोई प्रेम कविता
पढ़ता रहा
सोचता रहा
तुम्हारा चेहरा
अलबम को आज निकालकर तस्वीरें पलटता रहा
थियेटर में अंतिम फिल्म
हमने साथ देखी थी
जंगल बुक का
वो शेर खान
मर चुका था उस फिल्म में
उसे मोगली ने मारा था
मानवीय दिमाग के इस्तेमाल से
तुमने कहा था
फिल्म तो बहाना था
बस कुछ पल
हमें साथ रहने का
वो बहाना था
रिक्शे पर लौटते हुए
भरी सड़क पर
मेरे गालों पर तुम्हारा चुम्बन
इस जनम का ईनाम है मेरा
पता नहीं था कि
ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग
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कौन बेगुनाह और कौन अपराधी

मैं बदसूरत हूँ इसलिए बेईमान कहलाऊंगा चोर और बेईमानों का आकलन अपने देश में चेहरे की सुन्दरता पर निर्भर है ! जैसे धर्म के आधार पर तय कर लि...