Thursday, May 18, 2017

हर बेवक्त और गैरज़रूरी मौत को देशहित में जोड़ दिया जायेगा !

मनपसंद सरकार पाने के बाद
जिस तरह चढ़ता है सेंसेक्स
ठीक उसी दर बढ़ रही हैं
हत्याएं इस मुल्क में !
यह आधुनिक विज्ञान का युग है
जब हम टीवी पर
शौच के बाद साबुन से हाथ धोना सीख रहे हैं
जब, धार्मिक उन्माद और सांप्रदायिकता
अपने शिखर पर हैं
टीवी पर शांति के उपदेश दिए जा रहे हैं !
मुल्क को बुखार है शायद
नदी में डुबकी लगाकर
सब पाप मुक्त हो रहे हैं
जब राजा ने खुद को फ़क़ीर कह दिया तो
प्रजा के लिए बचा क्या है ?
फैसले की ज़िम्मेदारी
उन्माद , बेकाबू भीड़ को सौंप दी गयी है
सत्ता का निर्देश है
सवाल न करें
अब हर बेवक्त और गैरज़रूरी मौत को
देशहित में जोड़ दिया जायेगा !

मुझे कौन बचाएगा इन अपराधों से ?

अपराधों की सूची बना ली गयी है
सवाल करना अपराध है
प्रेम उससे बड़ा अपराध
गरीबी सबसे क्रूर अपराध
हक़ मांगना तो सबसे कठोर अपराध है
आदिवासी, मुसलमान होना उससे भी गंभीर अपराध इस समय देश में
गाय के पास से गुजर जाओ तो
ध्यान रहे कि
उसकी गंध भी न भटके तुममें
ऐसा होने पर सज़ा ए मौत हो सकती है अब
चुपचाप पड़े रहो
सत्ता के निर्णय को किस्मत मान लो
इसी में जिन्दगी का सार है
और मेरा
मन है कि
सवाल पूछने
विद्रोह करने पर उतारू है
मुझे कौन बचाएगा इन अपराधों से ?

Monday, May 15, 2017

मौत से वफ़ा सीखने का वक्त है

धरती ने क्या चाहा
नहीं पता आकाश को
किसान को पता था
और किसान मर गया
एकदिन भूख से
सागर की चाहत
चाँद को पता थी
नदी का मार्ग किसे पता था !
रिश्तों की नींव हिल रही है
अविश्वास और औपचारिकता के दायरे में
यह वक्त
संदेहमुक्त होने का वक्त है
यह खुद को पहचानने का वक्त है
जिन्दगी जब भरोसा नहीं करती खुद पर
मौत से वफ़ा सीखने का वक्त है

Saturday, May 13, 2017

समेट लो कुछ रेत वक्त नापने के लिए !

लगता है कविता से दूर हो गया हूँ
जैसे तुम से बिछड़ गया हूँ
बहोत फ़िक्र थी तुम्हें , मेरी
ऐसा मुझे भी लगा था
मेरी आँखें क्यों भीग जाती हैं
 सूखे के मौसम में !
इस रहस्य का पता
केवल तुम्हारे पास है
और तुम
कोई पहाड़ नहीं
मैंने सोचा था मैदान हो
मैं नदी बन कुछ विस्तार चाहता था
अपने अस्तित्व का
पता चला हृदय से मरुस्थल हो
मर गयी नदी
समेट लो कुछ रेत
वक्त नापने के लिए !

मुझे तुमने कवि माना चुपके से !

मेरी नींद उड़ गयी !
क्यों ?
पड़ोसी मुल्क में एक धमाका हुआ
25 मरे
कश्मीर में पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने
गोलीबारी की
एक माँ शहीद हो गयी
एक माँ के बेटे के साथ
मुल्क के भीतर मारा गया
एक नागरिक
उसकी थाली पर
सत्ता की नज़र थी
इक इबादतगाह पर हमला किया
एक धार्मिक संगठन की सेना ने
एक प्रेमी जोड़े को
मौत की सज़ा सुना दी गयी
प्रेम के जुर्म में
किसानों के एक समूह ने
आत्महत्या कर ली
क़र्ज़ के बोझ से
मैंने प्रेम किया नि:स्वार्थ
और असफल हुआ प्रेम में
मेरी कविता शमशान
या किसी कब्रिस्तान में पढ़ी गयी
मेरी मौत के बाद
मुझे तुमने कवि माना
चुपके से!

नदी / मेरी आँखें

नदी ने राह मांगी 
मैंने अपनी आँखें बिछा दी

Tuesday, May 9, 2017

मैंने पीठ दिखाना नहीं सीखा अब तक

मेरी हत्या की सारी तैयारी हो चुकी है
हत्या के बाद
न मेरी लाश मिलेगी
न ही मेरी हड्डियाँ
मेरी हत्या की तैयारी
बोलने वाले
चील, कौओं और गीदड़ों ने की है
इस बार
वे न तो मुझे दफनायेंगे
न ही जलाएंगे मेरी लाश को
और मैं हूँ
कि उनकी इस साजिश को समझते हुए भी
निहत्था खड़ा हूँ तुम्हारे पक्ष में
बात तुम्हारी मुक्ति तक सीमित नहीं है
मेरी लड़ाई
तुम्हारे सुखद और सुरक्षित भविष्य की भी है
और मैं जानता हूँ
कि वे कुछ नहीं बिगाड़ सकते मेरा
मेरी विजय से पहले |
बात दुश्मनों की तो समझ सकता हूँ
पर तुम कैसे शामिल हो गये उनके पक्ष में
मेरी हत्या की साजिश में ?
जबकि तुम्हें पता है
कि मेरे जाने के बाद भी यह सवाल
करता रहेगा तुम्हारा पीछा
लड़ाई में हार दुश्मनों से नहीं होती हर बार
कुछ अपने भी हरा दिया करते हैं कभी -कभी |
मैं बार-बार याद कर रहा हूँ
आज़ादी की इस संघर्ष में
साथ देने का तुम्हारे वादे को
और मैंने दिया था भरोसा
कि निराश नहीं करूँगा तुम्हें आखिरी साँस तक
फिर कैसे बदल गया ये मौसम अचानक !
कैसे हुआ यह सब
कि तुम भी खड़े हो गए मेरे विरुद्ध मेरे दोस्त ?
बहुत मासूम हो तुम साथी
कि समझ नहीं पाये उनकी चाल
चलो, तुम साथ न सही
तुम्हारे उस झूठे वादे को साथ मानकर
लडूंगा
मैंने पीठ दिखाना नहीं सीखा है अब तक |

Friday, May 5, 2017

यह वक्त बोलने का है

यह वक्त बोलने का है
चीखने और लड़ने का है
ऐसे समय में
तुम्हारी ख़ामोशी से
भयभीत हूँ मैं
तुम बोलो
या न बोलो
तुम्हारे पक्ष में
मैं आवाज़ उठाता रहूँगा
तुम्हारे हक़ के पक्ष में
पर अब तुमसे
कुछ बोलने की अपील नहीं करूँगा
तुम लेना अपना निर्णय
अपने समय से
मेरा संघर्ष जारी रहेगा
साँस के टूटने तक |

आज तुम, मुझे अपने सपने में देखना

जब तक
मैं लौटा,
गहरी नींद आ चुकी थी तुम्हें
जंगली फूल की महक से
भर गया था मेरा कमरा !
तुम्हारी नींद में
कोई ख़लल न पड़े
इसलिए
बड़ी सावधानी से प्रवेश किया
तुम्हारे स्वप्नों की दुनिया में
आज तुम,
मुझे अपने
सपने में देखना |

Wednesday, April 26, 2017

नि:शब्द है हमारा दर्द

नि:शब्द है 
हमारा दर्द 
आओ,
आँखों से साझा करें इसे 
हम, एक -दूजे से

कभी न माँगना मेरा अकेलापन

मैं एक यायावर हूँ
ठहराव नहीं,
राह चाहिए |
फिर भी 
कभी भूले से
यदि पहुँच जाऊं 
तुम्हारे शहर
तो मांग कर देखना कुछ
दे जाऊंगा सब कुछ |
केवल मुझसे
कभी न माँगना
मेरा अकेलापन,
मेरी उदासी
मैं  दे न सकूँगा |
-तुम्हारा कवि
तुम्हारे लिए
26 अप्रैल 2016

Monday, April 17, 2017

यहाँ बिना लड़े नहीं मिलता जीने का अधिकार

ठीक इस वक्त
जब मैं,
और आप
अपने -अपने कमरे में
बैठे हुए अखबारों की सुर्खियाँ चाट रहे हैं 
गाँव में मगरू और गोबरधन
फटी धरती पर खड़े होकर
रूठे हुए आकाश को ताक रहे हैं
उनके ठीक बगल में
शरत बाबू का 'महेश'
उदास खड़ा है
गफूर की नन्ही अमीना
गयी है कहीं दूर
पानी की खोज में
इधर दिल्ली के निज़ाम ने
अपने नये सूट के माप के लिए
टेलर मास्टर को राजभवन आने का आदेश दिया है
तुम अपने वातानुकूलित शयनकक्ष में अंगड़ाई लेके फिर से सो गये
मैं पसीने में तर
तुम्हारे नमक का हक अदा कर रहा हूँ
यदि किसी दिन हाथ आ गया सूरज
उसे निचोड़ दूंगा
मैं,
मगरू और गोबरधन के गाँव जा रहा हूँ
वहां महेश से कहूँगा
भारत में रहना हो तो
गफूर को अपना मालिक मत बनाना फिर कभी
और अमीना से कहूँगा
कि जीना है तो
अपना नाम बदल ले
या उठा ले क्रांति मशाल हाथों में
यहाँ बिना लड़े नहीं मिलता जीने का अधिकार
आज़ादी का आना अभी बाकी है साथी |

Friday, April 14, 2017

जनकवि रोता है

अपराध की बड़ी घटनाएं
जब सिमट जाती हैं
अखबारों के भीतरी पेज के किसी छोटे से कोने में
और जब लोगों की रूचि बदल जाती है
व्हाट्स एप चैट पर 
ऐसे में संवेदनाएं डिजिटल होकर
बह जाती हैं
बारिश के पानी की तरह
प्रेम डूब जाता है
बाढ़ में खेतों की तरह
सत्ता ठहाका लगाती है
अपनी जीत पर
किसान फांसी लगाता है
अंधकार अपने साम्राज्य का विस्तार करता है
भांड लीन हो जाते हैं जयगान में
माँ मजबूर हो जाती है
भूख से तड़पते अपने बच्चे के लिए
प्रेमियों को सुना दी जाती है
सज़ा-ए-मौत
अंधकार कोने में
जनकवि रोता है
कि उसका लिखा कुछ काम न आया !

Thursday, April 13, 2017

मेरी प्रेम कहानी तस्वीरों में कैद है

यह लोकतंत्र का वो दौर है मेरे देश में
जब योग सिखाने वाले
व्यापारी को दी जाती है
जनता की कमाई से
सरकारी सुरक्षा 
सत्ता की तारीफ़ करने वाले पत्रकार भी
पा जाते हैं सुरक्षा गार्ड !
सत्ता की जीत पर लडडू  बाँटते पत्रकार
हमने देखे हैं
जबकि पत्रकार को हमेशा
सत्ता के विपक्ष में होना चाहिए !
यहाँ प्रेमियों पर पहरा देने
उन्हें पीटने के लिए
बहुत दल गठित हैं अब
किन्तु
प्रेम की रक्षा के लिए
कोई नहीं है
मैं खबरों से निकल कर
तस्वीर देख रहा हूँ
जिनमें तुम
मेरे कंधे पर सर रख कर
मुस्कुरा रही हो !
मेरी प्रेम कहानी
तस्वीरों में कैद है !

Monday, April 10, 2017

अपना अधिकार मांग के देखिये

अपराधी बनने के लिए
अपराध करने की जरूरत नहीं
केवल सत्ता से
कोई सवाल कर लीजिये
मैंने तो इससे भी बहुत कम कुछ किया
तुमसे प्रेम किया
और अपराधी घोषित हो गया
अच्छा चलिए
आप न सवाल करिए
न ही प्रेम कीजिये
आप केवल अपनी जमीन
अपना अधिकार मांग के देखिये
आपको पता चल जायेगा
अपराधी कैसे बना दिए जाते हैं
लोकतंत्र में
चलो छोड़ो इन बातों को
आप खुद को मुसलमान बता कर
एक गाय खरीद लीजिये
अखबारों के मुख्य पेज पर
आपकी मौत की खबर छप जाएगी अगले दिन
- मैं, वही
तुम्हारा कवि

Saturday, April 8, 2017

मेरी माँ कोई गाय नहीं है

मैं कवि हूँ
और अब ख़बरें लिखता हूँ
जबकि उन ख़बरों में
मैं होता नहीं हूँ
क्योंकि कवि 
कविता में होता है
और कविताएँ अब
बची नहीं हैं मुझमें
क्यों कि अब
मुझमें बचा नहीं है
प्रेम !
रोज- रोज हत्याएं
सत्ता की खुली छूट
मेरी आँखों का पानी सूखने लगा है
अब शायद बह निकले लहू मेरी आँखों से
गरीब अपना घर छुड़ाना चाहता है
पर उसे देना होगा
गाय की भलाई के लिए टैक्स
टैक्स के रूप में जिन्दगी भी ले सकती है सत्ता
गरीब को मरना होगा
गौ-माता की जिन्दगी के लिए
यह राजकीय आदेश है
सुनो, सत्ता !
मेरी माँ कोई गाय नहीं है
मेरी माँ इन्सान है
और उन्होंने मुझे
इंसानों के लिए मरने की सीख दी है |




Wednesday, April 5, 2017

इंसानी लाशों पर महानता की कहानियां

महान सम्राटों और साम्राज्यों की
महानता की कहानियां
लिखी गयी हैं
लाखों -करोड़ों इंसानी लाशों पर
इतिहास में दर्ज़ तमाम महानताओं की बुनियाद में 
करोड़ों इंसानी लाशें दबी हुई है
आतंक और अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए
पहले राजा छोड़ देता था
अपने एक बेलगाम घोड़े को
अवैध रूप से जहाँ तक
चला जाता था घोड़ा
वहां तक फैल जाता था राजा का साम्राज्य
या फिर
राजा करता था
कलिंग जैसे किसी शांतिप्रिय राज्य पर
अवैध चढ़ाई |
अश्वमेध के लिए अब
घोड़े नहीं बचे हैं राजा के पास
राजा के पास अब
केवल गौशालायें हैं !

Saturday, April 1, 2017

शरत बाबु लौट आइये अमीना , गफ़ूर और महेश आपसे सवाल करना चाहते हैं

ओ आमीना के अब्बा
ग़फ़ूर भाई
अच्छा किया तुमने कि
अब तुम उन कट्टर खोखले ब्राह्मणों के गांव में
नहीं रहते 
शरत बाबु ने बहुत अच्छा किया था
कि , तुम्हारे गांव छोड़ने से पहले ही
महेश को तुम्हारे हाथों मरवा दिया था
ब्राह्मणों को तो यही लगा था कि
तुमने एक बैल की निर्मम हत्या की थी
पर सच तो यह था कि
तुमने ब्राह्मणों की गालियों से मरने से
महेश को बचाया था
मुझे तो नन्ही आमीना की आँखों में
अब दिख जाता है
खेलता -मुस्कुराता महेश
आमीना उसे भात का माड़ पिला देती आज भी
पर ग़फ़ूर की झोपड़ी में अनाज का एक दाना नहीं बचा है
आज देश आज़ाद है
दस्तावेज पर तो यही लिखा है
और आजादी के बाद ख़त्म होगी भुखमरी ,
भेदभाव,
और मिलेगा न्याय और अधिकार बिना भेदभाव !
पर ऐसा हो नहीं सका |
शरत बाबु लौट आइये
अमीना , गफ़ूर और महेश
आपसे सवाल करना चाहते हैं।
 ----
मैं ,
आपका एक पाठक
नित्यानंद गायेन

Thursday, March 30, 2017

समय रहते चुनिए अपना पक्ष

जहाँ प्रेम पर पहरा हो
जहाँ एक पशु
मनुष्य से ऊपर हो जाये
उस पशु के शुद्ध गोबर से बने
उपले (गोईठा) 
हवन के लिए बिकने लगे ऑनलाइन
ऐसे समाज में जहाँ
जनहित में जहाँ सत्ता से सवाल करना हो
सबसे बड़ा अपराध
मानवीय मूल्यों की बात करना
खतरनाक है
पर,
मुक्तिबोध कह गये हैं
अब 'गढ़ और मठ तोड़ने होंगे ।'
कौन बनेगा अपराधी
मुक्तिबोध के कथन का पालन करने को
कौन है तैयार ?
अब, जब राजा ही देश है
और राजा की नीतियों की आलोचना
देशद्रोह का अपराध है
तब हम संविधान की दुहाई देते हुए
खामोश हो जाते हैं
राजा देवता का प्रतिनिधि होता है
इस कथन को याद करने के लिए
हमें यूनान या प्राचीन रोमन साम्राज्य में जाने की आवश्यकता नहीं है ।
केवल समय रहते चुनिए अपना पक्ष
अपने भविष्य के लिए ।

Monday, March 27, 2017

मैं, ज़िद में नहीं लिखता कविता

मैं,
ज़िद में नहीं लिखता कविता
न ही शौकिया लिखता हूँ
मैं तो कविता जीता हूँ
बेचैन होता हूँ
जिस तरह प्रेम
शौकिया नहीं होता
ज़िद से प्रेम हासिल नहीं होता
ठीक उस तरह
मैंने कविताएँ लिखी नहीं
लिख गयी हैं
जैसे हुआ था
तुमसे प्रेम मुझे
दरअसल साहित्य के विद्यार्थी समझ नहीं पाते
प्रेम कविता
विद्यार्थी डिग्री के लिए साहित्य पढ़ते हैं
मैं कविता लिखता हूँ
दर्द और प्रेम की अभिव्यक्ति के पक्ष में
कम से कम
मैं रहूँ
या न रहूँ
मेरी कविताओं में
बचा रहे मेरा प्रेम
विरह की पीड़ा
और तुम्हारी बेवफ़ाई
ताकि बची रहे
हमारी प्रेम कहानी सदियों तक !

Saturday, March 25, 2017

मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है

मैं, तुमसे बिछुड़ने से डरता था
तुमने कभी महसूस नहीं किया था
मेरे इस डर को

मैंने कहा था तुमसे
कभी तुम सागर बन जाओ 
मैं, नदी बन
तुमसे मिलने आऊंगा

ऐसा हुआ नहीं
पर तुमने एक नदी
मेरी आँखों में भर दी
मुझे तनहा छोड़ कर
आज मैं
एक मरुस्थल हूँ
मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है
और मरी आँखें नम हैं
आना कभी मन हो तो
मैं इंतज़ार करूँगा....





Friday, March 24, 2017

योगी सत्ता में

एक योगी
टीवी पर योग सिखाते -सिखाते
अब टीवी पर
साबुन ,
तेल,
नून, दातुन पेस्ट
और घी आदि बेचने लगा है
हाँ, वही
जो सलवार-शूट पहिनकर भागा था
बिलकुल वही
जिसने टीवी पत्रकार से कहा था
जब वो मूतने जाता है तो
दो हजार लोगों की भीड़ जमा हो जाती है
हाँ, वही
जिसने कहा था
कि कानून का डर है
वर्ना कईयों की लाशें बिछा देता !
एक संत बना बैठा बलात्कारी
उसकी आसा
जेल में निराशा में बदल गयी
और अब एक
प्रेमियों पर कड़ी पहरा बैठा कर
खूब मजे ले रहा है
गाजीपुर के मुर्गी व्यापारी सहमे हुए हैं
मुर्गियां बिकना नहीं चाहती
काशिम मुल्ला का परिवार
भुखमरी के द्वार पर खड़ा है
दिन में एक बालिका बता गयी
कि कौटिल्य साधू था
मुझे लगा था
कि वो तक्षशिला विश्वविद्यालय में
राजनीति का प्राचार्य था
पर जब कोई भक्त कुछ नया कहें
तो मान लेना बेहतर
मेरे बहुत दोस्त हैं
ऐसा मैं भी मानता था
साधुओं की तरह
उनके चेहरे भी रोज खुल रहे हैं
मैं समझदार हो रहा हूँ
उनके चेहरे की रौनक से
मतलब मेरा भ्रम टूट रहा है
उन्हें भी पता चल गया है

Thursday, March 23, 2017

इस देश में प्रेम निरोधक दस्ते

सागर ने कहा नहीं
नदी से अपनी बेचैनी
देखने वालों ने
लहरों को टूटते देखा
तट पर 
नदी ने कही नही
विरह की पीड़ा
बहती रही लगातर
बांध बना कर रोक दिया
नदी की प्रवाह को
मुझे तुमसे मिलने नहीं दिया
अपने ही लोगों ने
यह मेरी -तुम्हारी कहानी है
कोई क्या समझेगा
प्रेमियों की व्यथा
प्रेम अपराध है उनके लिए
क्यों कि
वे खुद वंचित हैं
प्रेम से ..
अब इस देश में
प्रेम निरोधक दस्ते बनने लगे हैं
चलो हम मिलेंगे ऐसी जगह पर
जहाँ चाँद को भी रहेगा इंतज़ार
हमारे मिलन का |

तुमसे बिछड़ गया मैं

इस बार घर से लौटते हुए 
ट्रेन रुकी दुर्गापुर स्टेशन के
उसी प्लेटफार्म पर
जिस पर मैंने उस दिन
तुम्हारे आने का 
इंतज़ार किया था
आज,
मैं अकेला हूँ
सफ़र में !
ख्यालों का 
भविष्य नहीं होता
मैंने तुम्हें अपना भविष्य माना था
ख्याल टूटे
मिलकर तुमसे 
बिछड़ गया मैं
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Tuesday, March 7, 2017

बहुत बेपरवाह हूँ मैं

रात का सन्नाटा
पसर रहा है
मेरी हड्डियों में
बालकनी में खड़ा होकर 
बहुत देर तक देखता रहा
रात के आकाश को
दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं
तुम्हारी नाक की नथ की तरह
मुझसे उब कर
विदा लेने के कारण को
खोज लिया है मैंने
बहुत बेपरवाह हूँ मैं |
----------------------
तुम्हारा कवि सीरिज से

निर्णायक समय पर पक्ष का साफ़ होना जरुरी है

पुरस्कार, चर्चा और नाम के लिए
जीने -मरने वाले
लोगों को
पहचानते हैं आप ?
वो उधर भी हैं
इधर भी !
मतलब
वे, वक्त के हिसाब से
बदलते हैं अपना रंग |
वे खूब जानते हैं
गलत -सही
सच -झूठ
पर अच्छे बने रहना चाहते हैं
दोनों ओर
ऐसे लोगों का पक्ष निर्धारित नहीं
और मुझे लगता है
निर्णायक समय पर
पक्ष का साफ़ होना जरुरी है
वो,
जो दोनों ओर है समान रूप में
वो मेरी ओर नहीं है
उनकी चाल मैं समझ चुका हूँ |

मेरी/ तुम्हारी प्रेम कहानी

तुम्हें भुलाने को
सोने की कोशिश
बहुत की
पर रात ने जिद्द नहीं छोड़ी
और मेरी आँखों ने 
रात का पक्ष लिया
#मेरी/ तुम्हारी प्रेम कहानी

मेरे मेरे दामन पर लगे हैं

तुम्हारे छोड़े हुए टूथब्रश से
मैं अपने कत्थई दांत
साफ़ करने की कोशिश
करता हूँ हर सुबह
दाग मेरे दांत से गहरा
मेरे दामन पर लगे हैं
मैं,भावुक होकर लिखता रहा
तुम्हारा कवि!
पिट गया
मैं लूट गया
एक तरफ़ा इश्क़ में !

Sunday, March 5, 2017

दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं

रात का सन्नाटा
पसर रहा है
मेरी हड्डियों में
बालकनी में खड़ा होकर 
बहुत देर तक देखता रहा
रात के आकाश को
दो नक्षत्र खामोश जड़े हुए हैं
तुम्हारी नाक की नथ की तरह
मुझसे उब कर
विदा लेने के कारण को
खोज लिया है मैंने
बहुत बेपरवाह हूँ मैं |
----------------------
तुम्हारा कवि सीरिज से

Saturday, March 4, 2017

मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ

हत्या
बहुत मामूली बात हो गयी है
मेरे देश में
मेरे कान
यंत्रणापूर्ण चीखों से भर गये हैं
वो चीखें अब
नदी बन
सैलाब लिए
मेरी आँखों से बाहर आने को
बेताब हैं
मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ
रात भर |
काश, मुझे इस वक्त
सर टिकाने को
मिल जाता
तुम्हारा कंधा
-तुम्हारा कवि सीरिज से


Tuesday, February 28, 2017

अमन के पक्षधर हैं जो

गाँधी शांति के पक्षधर थे
एक उग्र राष्ट्रवादी ने उनकी हत्या कर दी
क्या हुआ था महान मार्टिन लूथर किंग के साथ
याद कीजिये जरा 
4 अप्रैल 1968 को
जब वे अपने होटल के कमरे की बालकनी में खड़े थे ?
उनको भी मार दी गयी थी गोली
आज़ादी के पक्ष जिनका कोई योगदान नहीं
वे केवल हत्या करना जानते हैं
गुरमेहर भी युद्ध के पक्ष में नहीं है
उसने अमन की वकालत की है
उसे भी डरा रहे हैं
आज के नव राष्ट्रवादी !
अमन के पक्षधर डरते नहीं
युद्ध मानवता के पक्ष में नहीं
विनाश का पर्याय है
हर युद्ध
आखिरकार दो महायुद्धों के बाद भी
तमाम शक्तियों को
शांति वार्ता के लिए आना पड़ा था
एक टेबल पर |
किन्तु,
वो याद किसे है ?
युद्धोन्माद अँधा बना देता है
अक्ल से |

Monday, February 27, 2017

बदनामी से डर किसे है

कर्ज़ कुछ बाकी हैं
अभी ज़िंदगी के
वर्ना
अब तक
रुख़सत ले चुकी होती ज़िंदगी
बदनामी से डर किसे है
इश्क़ से खौफ़ लगता है
दुश्मन से नही
अब दोस्त से डर लगता है |

Saturday, February 25, 2017

इस अनजान दुनिया में

अभी -अभी लौटा हूँ
ऑफिस से
रास्ते में ऑटो वाले भैया ने
खैनी बना कर दिया
उन्हें लगा 
मैं भी बिहारी हूँ
वे मोतिहारी के थे |
कितना अच्छा लगता है
जब कोई अनजान
पहली बारी में आपको
अपना समझने लगे
उन्होंने मुझे
मेरी भाषा से पहचाना
मतलब उन्हें बिलकुल पता न चला
कि मैं ,
बिहारी नहीं
बंगाली हूँ |
ऐसे में आप ही बताइए
मैं कैसे कहता उनसे कि
मैं, बिहारी नहीं
बंगाली हूँ
हिंदी में लिखता हूँ !
मेरी भाषा ने
मुझे एक अनजान से दोस्ती करवाई
भाषा उधार की नहीं होती
भाषा,
केवल भाषा होती है
एक पहचान की
जिससे हम खोज लेते हैं
इस अनजान दुनिया में
किसी बिछड़े हुए
अपने को |

तुम्हारा कवि

1.
कब तक लगाते रहोगे
अपनी तस्वीर दीवार पर ?
कभी आईना से भी
कुछ पूछ लेते 
तो अच्छा होता
-तुम्हारा कवि

2.
तुम्हारे संघर्ष की कहानी में
छिपी हुई है
मेरी नई कविता
करीब आओ तो
पढ़ सकता हूँ उसे 
मैं तुम्हारी आखों में।

Thursday, February 23, 2017

घटनाएं निंदनीय नहीं होती

घटनाएं
निंदनीय नहीं होती
न ही दुखद होती हैं
क्योंकि निंदा या अफ़सोस से
घटनाएं बदल नहीं जाती
घटनाएं घटने के लिए होती हैं
पर घटती नहीं
बढ़ती जाती है
समय और विकास के साथ
जो कुछ होता है
घटनाओं में लिप्त
मनुष्य का होता है
करने वाला भी
और भोगने वाला भी वही
हाँ,कुछ घटनायें
भयानक होती है
आज की तरह |

Wednesday, February 22, 2017

मेरा होकर बहुत तनहा रह गया है

दिन भर की तमाम
अराजक घटनाओं को झेल कर
खुद को भरोसा देता था
कमरे पर लौट कर
तुमसे लिपट कर रो सकता हूँ मैं 
तुमने मुझसे विदा मांग ली
और मैं अनाथ हो गया उस दिन
अक्सर अब
कमरे में लौट कर
देखता हूँ बुद्ध की उस तस्वीर को
जिसे तुम्हारी पसंद से
हम साथ खरीद लाये थे
अपने 10 / 12 के कमरे की
खाली दीवार के लिए
बुद्ध की वो तस्वीर
आज भी टंगी हुई है 
मेरे कमरे की दीवार पर
बस अब यह कमरा
हमारा से
मेरा होकर
बहुत तनहा रह गया है

दिन भर जूझता है
अपने अकेलेपन से
मेरी तरह
तुम बताओ
खुश तो हो न
अपने भरे -पूरे घर में
इनदिनों
मुझसे आज़ादी के बाद ?
इस कमरे में
उन 30 दिनों की
यादों के सिवा
कुछ भी नहीं बचा है
मेरे पास |
#तुम्हारा कवि सीरिज से

Monday, February 20, 2017

उसे पहचानों

वो कौन है
जो हमारी इज़ाजत के बिना
हमारे हक़ में
फैसला लेने का दावा करता है?

वो कौन है
जिसका हाथ रंगा हुआ है
इंसानी खून से
और हमारी रक्षा की बात करता है ?

हम क्यों हैं ख़ामोश
अपने ही लोगों की चीखें सुन कर
वो कौन है
उसे पहचानों
जो दोषी है
हमारी तकलीफ़ों के लिए 

Sunday, February 19, 2017

अब जुदा होके

1.
प्रेम में रहते हुए
कभी लिख नहीं पाया
प्रेम कविता
अब जुदा होके
रोना चाहता हूँ 
और निकल आती है
कविताएँ
अब अक्सर
उभर आती है बनारस की गंगा
मेरी आँखों में
जिसे मैंने देखा था शांत बहते हुए
तुम्हारी आँखों में
तुमसे लिपट कर रोना चाहता हूँ
और तुम .....
उफ्फ ....

2.

तुमने मुझे भूला दिया
यह पता है मुझे
मैं तुम्हें
याद नहीं करता
तुम्हें भूला नहीं हूँ 
भूलूँगा नहीं
आखिरी साँस के बाद भी
कवि हूँ तुम्हारा
तुमसे प्यार किया
मैंने !
-तुम्हारा कवि सीरिज से

Tuesday, February 14, 2017

ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग

अंग्रेजी कैलेंडर में दर्ज़
'प्रेम दिवस'
भी आज निकल ही गया
जैसे निकल जाता है रोज के दिन
पर कुछ दिन सच में खास होते हैं
या बना दिए जाते हैं
मुझे बहुत ख़ुशी होती है
जब दुनिया में प्रेम की बातें होती हैं
वर्ना रोज -रोज नफ़रत और जंग की बातों ने
जीवन को नरक जैसा बना दिया है
वैसे मैंने न तो स्वर्ग देखा है
न ही नरक
जो कुछ देखा इस धरा पर देखा है
धरती खुबसूरत है
पर प्यार करने वालों ने इसे और भी खुबसूरत बना दिया है
मैंने आज
नहीं लिखी कोई प्रेम कविता
पढ़ता रहा
सोचता रहा
तुम्हारा चेहरा
अलबम को आज निकालकर तस्वीरें पलटता रहा
थियेटर में अंतिम फिल्म
हमने साथ देखी थी
जंगल बुक का
वो शेर खान
मर चुका था उस फिल्म में
उसे मोगली ने मारा था
मानवीय दिमाग के इस्तेमाल से
तुमने कहा था
फिल्म तो बहाना था
बस कुछ पल
हमें साथ रहने का
वो बहाना था
रिक्शे पर लौटते हुए
भरी सड़क पर
मेरे गालों पर तुम्हारा चुम्बन
इस जनम का ईनाम है मेरा
पता नहीं था कि
ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग
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Saturday, February 11, 2017

बहुत खारा है शहर का पानी

शहर खुबसूरत है
और बदसूरत है शहर का स्वभाव
यहाँ कम्पूटर ही नहीं
आदमी भी 'हैक' हो जाता है
सब लोग नहीं 
पर अधिकतर
शकुनी मामा भी पानी -पानी हो जाते
जो अब की आते आधुनिक इन्द्रप्रस्थ में
चेहरे पर मुस्कान लिए
फ़रेब वाले सब बना लेते उन्हें दोस्त
और बता देते
षडयंत्र कैसे किए जाते हैं
ये आधुनिक शहर
बदल देते हैं दोस्ती की नियत
राजधानी है तो
राजनीति भी होगी
सच बोलने पर मिलती है धमकी
उठाएंगे सवाल चरित्र पर
सबूत बनाएं जाएंगे
जीत के लिए
ईमानदारी किस जन्तु का नाम है ?
पीड़ा में भी हंसने की कला शहर के बाजारों में मिल जाएगी
आप देहाती हैं
यही गुनाह है
ऐसा नहीं कि पूरा गाँव बहुत ईमानदार होता है
पर शहर जितना शातिर भी नहीं होता
शहर मतलब व्यापार केंद्र
ये शहर आपको
भीड़ में तन्हा कर देता है
कल ही पिंटू लौट गया अपने गाँव
उसने कहा बहुत खारा है
शहर का पानी !

Friday, February 10, 2017

मेरी कविता में तुम

उन तमाम पन्नों पर
 लिखे हुए हजारों शब्दों में
मेरी एक भी कविता शामिल नहीं है
क्योंकि उनमें कहीं
मैंने,
तुम्हारा नाम नहीं लिखा है
भूल गया था लिखना
तुम्हारे स्पर्श के अहसास को
दर्ज नहीं कर पाया
तुम्हारे साथ के सुखद पलों को
उन शब्दों में कहीं
इसलिए,
मत खोजना कोई कविता तुम
उन शब्दों के ढेर में
जब मेरी कविता बनेगी तो
उसमें तुम्हारी मौजूदगी का
अहसास होगा तुम्हें |
--------------
*तुम्हारा कवि सीरिज से 

हर बेवक्त और गैरज़रूरी मौत को देशहित में जोड़ दिया जायेगा !

मनपसंद सरकार पाने के बाद जिस तरह चढ़ता है सेंसेक्स ठीक उसी दर बढ़ रही हैं हत्याएं इस मुल्क में ! यह आधुनिक विज्ञान का युग है जब हम टीवी प...