मानव सभ्यता के सबसे क्रूर समय में
जी रहे हैं हम
हमारा व्यवहार और हमारी भाषा
हद से ज्यादा असभ्य
और हिंसात्मक हो चुकी है
व्यक्ति पर हावी हो चुका है
उसका मैं
इस मैं पर
हमारा कोई बस नहीं है
मेरा मैं गालियां बकने लगा है
हत्या करता है
फिर भी शर्मिंदा नहीं होता किसी अपराध पर
मैं शर्मिंदा होना चाहता हूँ हर अपराध के बाद
किन्तु मेरे मैं का अहंकार इतना मगरूर हो चुका है
कि अपराध का अहसास होने पर भी
वह शर्मिंदा नहीं हो पाता
और तब भी बड़ी बेशर्मी के साथ
खुद को मनुष्य बताते हैं हम
इसी मैं ने ही
आपसी रिश्तों को शर्मसार किया है
यही मैं ही
इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....
. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
-
. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
-
सपनों का क्या है उन्हें तो बनना और बिखरना है मेरी फ़िक्र इंसानों की है | कहीं तो बची रहे आँखों में इक बूंद इंसानियत तब हम बचा लेंगे इस धरती...
-
गाँधी ने पहनी नहीं कभी कोई टोपी फिर उनके नाम पर वे पहना रहे हैं टोपी छाप कर नोटों पर जता रहे अहसान जैसे आये थे बापू इस देश मे...
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन कुंवर नारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
ReplyDeleteसटीक
ReplyDelete