Thursday, September 1, 2011

खंडहर

शहर के बीचों -बीच
तन्हा खड़े 
खंडहर की दीवारों पर 
खुदे हुए हजारों नामों के बीच
मैंने कभी नहीं खोजा 
अपना नाम 
यूं  भी कभी
हिम्मत नहीं कर पाया , कि
पत्थरों पर लिखुँ 
मैं अपना नाम 
जब लिख नहीं पाया
कभी किसी दिल पर /

पत्थर तो  सह लेगा 
हर दर्द को 
दिल कहाँ सह पायेगा
नुकीले चुभन की पीड़ा ?
बेजुबान खंडहर की दीवारें 
चीखेगी नहीं कभी 
किन्तु अहसास है मुझे 
चुभन की पीड़ा की /

मेरे भी दिल पर कभी
लिखा था किसी ने 
अपना नाम 
एक लम्बी रेखा खींच कर 
आज कह नहीं सकता यकीन से 
कि -उसे याद है 
उनका  नाम मेरे दिल पर खुदा हुआ 
किन्तु-
बहते लहू धारा का  निशां
आज भी बाकी है
मेरे दिल पर //

8 comments:

  1. हिम्मत नहीं कर पाया , कि
    पत्थरों पर लिखुँ
    मैं अपना नाम
    जब लिख नहीं पाया
    कभी किसी दिल पर /

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  2. कि‍सी पर जबर्दस्‍ती छाप डालने की कोशि‍श बुरी बात है... पर प्‍यार में ऐसा हो सकता है.. अच्‍छे अर्थ हैं इस कवि‍ता के;;;

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  3. Kafi gehrai se apne pyaar ka use kia n sachai b dikhai... Nice one sir:-)

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  4. kaphi acchi kavitha hai. badhai

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  5. .
    अति सुन्दर , बधाई स्वीकारें.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.

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  6. समय- समय पर मिले आपके स्नेह, शुभकामनाओं तथा समर्थन का आभारी हूँ.

    प्रकाश पर्व( दीपावली ) की आप तथा आप के परिजनों को मंगल कामनाएं.

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  7. आपको भी ............. इसे आपका आशीर्वाद मानूंगा

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