Monday, December 19, 2011

हो कभी ऐसा



हो कभी ऐसा
कि मैं भी मुक्त हो जाऊं
उन पुरानी यादों से
मानसिक वेदना
और दिल की पीड़ा से
तब सोचुं मैं
केवल अपने बारे में

फिर कोई
ऐसी शाम आये
जब मैं रोऊँ
बैठकर अकेले में
तब तुम्हें मेरी याद आये

जानता हूं
कल्पनाएँ सच नही होती
लिख रहा हूं फिर भी
तुम्हारा नाम
दीवारों पर
मेरी बुरी आदतों में
ये भी शुमार है
क्या करूँ ...........
मजबूर हूं

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