Sunday, April 7, 2013

मैंने तुम्हें देखा नही नजरों से

मैंने तुम्हें देखा नही नजरों से 
सुनी है तुम्हारी आवाज़ पल भर 
मेरे दिल की धड़कन क्यों बढ़ने लगी 
पता है तुम्हें कुछ ?

मैंने देखा नही है 
तुम्हारा चेहरा 
पर बना लिया है एक चेहरा 
मन की दीवार पर 
कभी देखना आकर 
क्या यह तुम ही हो ?

यदि ठीक न बनी  हो सूरत
तो पोत देना कालिख मेरे चेहरे पर
 अफ़सोस न होगा मुझे

बस  भूल पर 
अपनी मुस्कुरा दूँगा 
हंसी की भाषा तो तुम्हें आती होगी ...
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केस्च गूगल से  साभार 

2 comments:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - भारतीय रेल के गौरवमयी १६० वर्ष पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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