Thursday, June 7, 2018

'अब बाय'

'अब बाय'
हो सकता है कि इन दो शब्दों के साथ ही
खत्म हो जाती हो आपकी बात
किन्तु
मेरी बातें ठीक इसके बाद ही शुरू होती हैं !
मैंने कब कहा कि उत्सव की रात आज ही है
उत्सव की पूर्व संध्या भी
जश्न के लिए काफी है |
सरकार के पूरे हुए दो साल शासन के
और तुम्हारे ?
याद है न ?
मुझे भय नहीं लगता
न ही मेरा कोई मालिक है
यदि होता भी तो
मैं भय से कभी नहीं जाता उसके शरण में
अँधेरा मुझे निगल सकता है
यह जानते हुए मैं कभी ऐसा न करता
कि मेरा कोई मालिक आता मुझे भय मुक्त करने
चाहे कितना भी खुबसूरत या समझदार क्यों न होता वो
मैं सिर्फ याद रखता कि
वो मालिक है , और मैं केवल गुलाम
और मालिक केवल मालिक होता है
मैं विद्रोह पर उतरूं हूँ
राजा का पतन अब तय है
या तय है
मेरी वीरगति !
जो भी होगा मैं स्वीकार लूँगा
पर विश्वासघात सह नहीं सकता मैं
पीठ पर नहीं
मेरी छाती पर करो वार |
कविता जो छूट गयी थी ....

1 comment:

  1. ऐसा कमाल का लिखा है आपने कि पढ़ते समय एक बार भी ले बाधित नहीं हुआ और भाव तो सीधे मन तक पहुंचे !!

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