Saturday, September 26, 2015

पानी की गहराई का अंदाजा नहीं था उन्हें

पानी की गहराई का अंदाजा नहीं था उन्हें
वे धकेलना जानते थे
डूबता हुआ व्यक्ति लड़ता है
सांसों से जंग
निपूर्ण तैराक ही पा लेता है फ़तेह
बाकी सब डूब ही जाते हैं
गोताखोर कूद जाते हैं पानी में
पूरी तैयारी के साथ
तल से उठा लाते हैं लाश
सांसों से उसकी संघर्ष की कहानी कोई नहीं जान पाता
धकेलने वाला शायद ही शर्मसार होता हो
देखकर उसे
वह तसल्ली देता है मन को
और सोचता है
उसने तो दिल्लगी की थी
यह तो मरने वाले की गलती थी
जो तैरना नहीं जानता था ||

Thursday, September 24, 2015

पता नहीं कितना बचा हूँ अब

मैं मिट रहा हूँ 
पल-पल
पता नहीं कितना बचा हूँ अब
कल रात ही मिटा दिया 
मैंने उन रातों को 
जो हमने गुजारी साथ-साथ
चाँद गवाह है
कि मैंने नहीं किया कोई फ़रेब तुम्हारे साथ
बस आ गया था अमावस हमारे बीच
जिसे तुमने मेरा धोखा समझा ||



Wednesday, September 23, 2015

तुम्हें अलविदा कहते समय

तुम्हें अलविदा कहते समय
छोड़कर जाने को बहुत कुछ होगा मेरे पास
मैं सिर्फ ले जाऊंगा
मेरे सबसे कठिन समय में
साथ खड़े होके
मेरे पक्ष में कहे हुए
तुम्हारे शब्दों को ....
अपने साथ

चित्र : गूगल से साभार

Monday, September 7, 2015

हर सच को अपनी आलोचना मानती हैं सत्ता

हम सच बोलेंगे
और क़त्ल कर दिए जाएंगे
सत्ता डरती है सच से
हर सच को अपनी आलोचना मानती हैं सत्ता
हम भूले नहीं हैं
सुकरात को
उसके ज़हर के प्याले में
मिला दिया गया था हमारे हिस्से का ज़हर भी
सत्ता नहीं जानती
ज़हर से व्यक्ति मरता है
सच नहीं ||

Thursday, June 18, 2015

तुम्हारी मीठी मुस्कान आज भी चिपकी हुई है मेरी आँखों पर

इनदिनों,
अपने खालीपन में
मैं अक्सर खोजता हूँ तुम्हें अपने आस-पास
और याद करता हूँ अतीत के सुहाने पलो को
तुम्हारी मीठी मुस्कान
आज भी चिपकी हुई है मेरी आँखों पर
हाँ , अब मेरी आँखें जरुर कमज़ोर हो चुकी है
इतना कमज़ोर कि 

अब मैं देख नहीं पाता हूँ साफ़ -साफ़
इन्द्रधनुष के रंगों को भी ||

Friday, June 12, 2015

ओ अमलतास

मैं उदासी चाहता हूँ
और तुम ऐसा होने नहीं देते
जीत जाते हो हर बार
तुम्हारा क्या करूँ मैं ?

ओ अमलतास !

Sunday, May 24, 2015

अपनी माटी से

मेरे गांव की हरियाली मुझमें समा गयी है
बहुत गाढ़ा है ये हरा रंग
मासी रोज लगा देती है मेरे गालो पर हल्दी 
तब -तब मैं खिल उठता हूँ
सुबह की तरह
खेत, पंछी , तालाब
और गांव की कच्ची सड़क उभर -उभर आते हैं
लिची का लाल रंग उतर आता है आँखों में
मैं आकाश को देखता हूँ
नीला हो जाता हूँ
रंगो का यह समागम
मुझे उल्लासित कर देता है
और तब मैं देखता हूँ क्षितिज पर डूबते सूरज को
झींगुर गाने लगता है
और मचलने लगते हैं जुगनू
सपने नहीं
अब एक नयी उम्मीद देखता हूँ
अपनी आँखों में।

डरा हुआ व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता

  डरा हुआ व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता मैं बहुत डरपोक हो गया हूं तुमसे मिलने के बाद तुम्हे जान लेने के बाद ! जबकि जानता हूं मैं डरपोक नहीं हूं...