कल शाम बैठा था
मैं नदी के किनारे
मध्यम लहरों को देखता रहा
ख्याल बुनता रहा
लहर टूटते रहे
मेरे ख्याल भी टूटते रहे
लहरों की तरह .
दूर किनारे के पार
डुबते रवि को देखता रहा
वह मुस्कुराता रहा
मुझे देखकर
और मैं उसे देख कर .
मेघों के कुछ अंश
खेल रहे थे
शांत नीलाम्बर मैदान पर
साँझ के शांत मिजाज़ का
लुफ्त उठा रहे थे वे
नही भूलता वह दृश्य
मेरे मन में शमा गया है .
Sahi hai bhai !!!!!
ReplyDeletebhavnaon ki athkheliyon mein doobte utarte yun,
ReplyDeletekahin beh na jana un lahron mein hee,
uss ravi ki ore|
- Nilay