Thursday, January 13, 2011

अनुभव पक रहा है

जहर मिला मुझे
दवा के नाम पर
बेवफाई मिली मुझे
प्रीत के नाम पर
क्षीण हो गया है
जीवन का कोलाहल
जीवन अब बन चुका है
केवल एक हलाहल /

पिस रहा है  जीवन
दिन प्रतिदिन
घुन की तरह
जल रहा है जीवन यहाँ
मई- जून की धूप की तरह
अनुभव पक रहा है
टांट पर बचे हुए
बाल की तरह /

2 comments:

  1. सरल शब्द है ...अछे भाव है ...शायद ये प्रश्न हम सभी को ..कचोटती है /

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