Wednesday, February 9, 2011

हार चुका है वृक्षों का दल

देवता लुप्त हैं
क्रूर मानव शेष हैं
विकृत पशुत्व्य बचा है /
तलवार खेलने के लिए बचे हैं अब
और
ढाल बंध  चुका है पीठ पर
बंदूक की गोली बिखरी पड़ी है हथेली पर
पांव पसार चुका है षड्यंत
और
भोजन में मिल चुका है विष
जीवन आज  विध्वंस है
और सारा वन उजड़ चुका है /
खाल, मांस .दांत नाक
सब छीन चुका है
पृथ्वी के बाज़ार में
ऊँचे दाम में
बेच कर लौटे हैं
क्या अपराध किया है
कि--
उनका हाथ निहत्या है आज ?

खो रहा है जीवन
और --
बन्धुत्व्य
नदी स्रोत खो चुकी है
हार चुका है वृक्षों का दल
फूल -पंछी -वायु -मेघ
घास -लता वनभूमि
और बहुत कुछ
हे -पृथ्वी तुम भी तो बन रहे हो मरुभूमि
कौन बचाएगा तुम्हें ?

4 comments:

  1. हिंसा की है सरकार यह,
    शोषण का है प्रतिकार भी |
    मैं क्षुब्द, स्थिर और हताश हूँ,
    चल छोड़ सब, कहीं और चल||

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  2. 11 January se lekar aabhi tak ki sabhi rachana ko aaj PADHANE KA SUAVASAR MILA, Man Aanandsar mein Nimajjit ho utha!! Sadhuvaad Sweekaren!!!

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  3. बहुत धन्यवाद निलय भाई एवम अरविन्द सर

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  4. धन्यवाद इस रचना के लिए ... बहुत अच्छे से सजाया है शब्दों को

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