Tuesday, May 15, 2012

शुद्धता बची है अभी


शुद्धता बची है अभी
हरे –भरे दरख्तों के बीच
मेरे गांव मिट्टी में , हवा में
तभी तो हंसते हैं वृक्ष,
चिड़िया और तालाब का पानी |

षड्यंत्रों की खबर से
दहल उठता है इनका मन
शहरी आगंतुक के
आने की सूचना पा कर
मछलियाँ चली जाती है
जल की गहराई में
काली परछाई से बचने को
सड़के रोक लेती हैं
अपनी सांसे
तुम्हारे गुजर जाने तक |

अतिथि देव: भव :
का अनुसरण कर
मैं बुलाता हूँ, तुम्हे
तुम भी ख्याल रखना इस बात का
ताकि नजरें उठाकर आ सकूं
मैं, फिर इस गांव में ...

4 comments:

  1. शहरी मेहमानों के प्रति चिंता जायज है ... पत्थर दिल शहरी इंसान किसी की नहीं सुनते बस बर्बाद करते हैं ..

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  2. आशा है गाँव में बची हो शुद्धता.......

    सुंदर भाव,
    सादर.

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  3. बहुत अच्छी कविता भई . गाँव के प्रति आपका प्रेम और आशंका दोनों ही तारीफ के योग्य है

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