Sunday, May 6, 2012

कवि अरुणाभ

गुवाहाटी के 
वशिष्ठ आश्रम के 
कवि अरुणाभ 
लाल होंठों पर लिए 
शब्दों के ताप 
ह्रदय में लिए प्रेम का प्रताप 
मुस्कुराते हैं 
मेरे ख्यालों में 

तुमसे कभी मिला था 
सहरसा में ,चैनपुर में 
आज भी मिलता हूँ तुमसे 
गुजरकर तुम्हारी रचनाओं से 

सुनो, मित्र अरुणाभ 
यूँ ही 
बढते रहना सृजन पथ पर 
निरंतर 
यूँ ही चमको तुम 
अरुण की भ्रांति.............

4 comments:

  1. koi kavi jab apni kavita me kisi kavi ko apne shabdo me dhalta hai to yah tay hota hai us kavi ne use bahut hi prerit kiya hoga ya koi aisi baat rahi hogi us kavi jisne majbur kiya ki aaj dusre duniya daari ke vishayon se hatkar ek insan ek kavi ke liye kuchh likha jaaye. aur khaskar Nityanand jaisa kavi jab kisi ko kuchh likhta hai tab baat ye tay ho jaati hai ki us wyakti ne nitya ko dil se bhaya hoga.

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  2. सुनो, मित्र अरुणाभ
    यूँ ही
    बढते रहना सृजन पथ पर
    निरंतर
    यूँ ही चमको तुम
    अरुण की भ्रांति..........
    ....
    बहुत सुन्दर नेक प्रस्तुति

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  3. main tumhaari duaao me shaamil main tumhare har kshto ko jhelne ki taqat rakhtaa hoon mujhe ek muka aur de dete to main tumhaare saath jaroor dekhtaa koi bodhi vriksh.........nitya bhai ki imaan ko salaam

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