Monday, October 29, 2012

बहुत कुछ कहती है ख़ामोशी

खामोश रेखाकार 
बहुत कुछ कहता है 
आँखों से 
जानते हो तुम 
आँखों की भाषा ?

नही , 
मैं नही कह रहा हूँ 
कोई पक्ष की बात 
केवल बयाँ कर रहा हूँ 
जो कुछ समझ पाया
झांक कर उनकी आँखों में

बहुत कुछ कहती है ख़ामोशी
आकाश से टूट कर गिरते तारे की तरह
वे मांगते हैं बंदकर मुट्ठी
अपने लिए दुयाएँ
क्या जाने ..
टूट कर बिखरने की पीड़ा ...?

ये सभी दानिश्वर हैं
लकीर की भाषा तो केवल
फ़क़ीर समझते हैं ....

-नित्यानंद गायेन
रायपुर ,27/10/12

2 comments:

  1. बढिया प्रस्‍तुति !!

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  2. प्रस्तुत कविता में नित्यानंद जी ने खामोशी का रेखांकन संभाव्यता की रश्मि से आखों को अभिसिंचित किया है.यह उनकी प्रखर संवेदना ही है कि उनके मौन में एक आकृति बनती चली जाती है और भावना का प्रवाह स्वयम को विराम देता हुआ कहता है '' लकीर की भाषा तो केवल
    फ़क़ीर समझते हैं'' ....यह उद्बोधन नित्यानंद जी की सम्वेगात्मकता को स्वर ,लय,ताल देती हुयी दिखती है...आपको ...बधाई सर्जना के लिए

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