Tuesday, February 12, 2013

तुम्हारा कुछ क़र्ज़ बाकी है मुझ पर ...


गलती करने के बाद ही अहसास होता है
अपनी गलती का हमें,
मुझे भी हुआ
एक बार नही , कई बार
पहली बार तब
जब मैंने स्वीकार किया तुम्हारा निमंत्रण
और चला आया था,  साथ -साथ तुम्हारे

यह अहसास तब हुआ
जब तुमने बीच राह में ही छोड़ दिया
मेरे प्रेम और विश्वास का दामन
मजाक बनाया मेरे स्छ्न्द व्यवहार का
और तुम्हें आने लगी साजिशों की बू मेरी हर बात पर
मेरी हर साँस से

उन सभी लोगों ने
जिन्होंने देखा मुझे ,
नासमझ कहा
और तुमने कहा
मुझे शातिर ..लम्पट

अब हर पल होता है यह अफ़सोस
कि दिन-ब -दिन  रिक्त हो रहा है
मेरे विश्वास  का कोश
और उधर फ़िदा हो रहा है जमाना
तुम्हारी मुस्कान के आगे

यकीं किस पर किया जाये आज
खुद के सिवा
और इस पर भी तुम बताते हो जमाने को
कि मैं खुदगर्ज हो गया हूँ

तुम्हारा  कुछ क़र्ज़ बाकी है मुझ पर
चुकाना तो पड़ेगा
ताकि सुकून मिले मेरी रूह को
जहाँ से रुकसत के बाद
वर्ना भटकना पड़ेगा मुझे
मौत के बाद

तुम्हें मालूम है न
मित्रता के कर्ज से मुक्त न हो सका था मृत्युंजय
और मारा गया निहथ्या...?

(स्केच- गूगल स्केच साईट से .साभार )

1 comment:

  1. Aap kaise likhte to aise? I am speechless... Every time.

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