Thursday, February 21, 2013

मैं बहुत विचलित हूँ इस शहर में अब ..


आज मैंने फिर देखा है
सड़कों पर इंसानी खून
मांस के चीथड़े
लहूलुहान इंसानियत

भेड़ियों ने दिन दहाड़े किया अपना काम
जिनके कंधों पर था
सुरक्षा का भार
वे सोते रहे गहरी नींद में

चारमीनार पर फिर से
दीखने लगीं हैं दरारे
खामोश है गोलकुंडा
बूढ़े खंडहर के रूप में 
शांतिदूत गौतमबुद्ध की प्रतिमा
हुसैन सागर के बीच
एक दम नि:शब्द

मैं बहुत विचलित हूँ
इस शहर में अब
 .....
21/02/2013 की शाम हैदराबाद में हुए बम विस्फोट के बाद लिखी एक रचना .

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4 comments:

  1. आज की ब्लॉग बुलेटिन अरे रुक जा रे बंदे ... अरे थम जा रे बंदे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत -बहुत शुक्रिया आपका . सादर

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