Saturday, March 25, 2017

मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है

मैं, तुमसे बिछुड़ने से डरता था
तुमने कभी महसूस नहीं किया था
मेरे इस डर को

मैंने कहा था तुमसे
कभी तुम सागर बन जाओ 
मैं, नदी बन
तुमसे मिलने आऊंगा

ऐसा हुआ नहीं
पर तुमने एक नदी
मेरी आँखों में भर दी
मुझे तनहा छोड़ कर
आज मैं
एक मरुस्थल हूँ
मेरी छाती पर रेत बिखरी पड़ी है
और मरी आँखें नम हैं
आना कभी मन हो तो
मैं इंतज़ार करूँगा....





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