Monday, March 27, 2017

मैं, ज़िद में नहीं लिखता कविता

मैं,
ज़िद में नहीं लिखता कविता
न ही शौकिया लिखता हूँ
मैं तो कविता जीता हूँ
बेचैन होता हूँ
जिस तरह प्रेम
शौकिया नहीं होता
ज़िद से प्रेम हासिल नहीं होता
ठीक उस तरह
मैंने कविताएँ लिखी नहीं
लिख गयी हैं
जैसे हुआ था
तुमसे प्रेम मुझे
दरअसल साहित्य के विद्यार्थी समझ नहीं पाते
प्रेम कविता
विद्यार्थी डिग्री के लिए साहित्य पढ़ते हैं
मैं कविता लिखता हूँ
दर्द और प्रेम की अभिव्यक्ति के पक्ष में
कम से कम
मैं रहूँ
या न रहूँ
मेरी कविताओं में
बचा रहे मेरा प्रेम
विरह की पीड़ा
और तुम्हारी बेवफ़ाई
ताकि बची रहे
हमारी प्रेम कहानी सदियों तक !

6 comments:

  1. http://bulletinofblog.blogspot.in/2017/03/blog-post_28.html

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    Replies
    1. बहुत आभार आपका |सादर

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  2. कविता - कोई ज़िद नहीं
    ना ही स्पर्द्धा हो सकती है
    कविता मन में उठता एक सैलाब है
    ...
    पढता और समझता भी वही है
    जिसके भीतर एक आग है

    ReplyDelete

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