Tuesday, September 7, 2010

बदलाव के इस दौर में

समय के साथ
सब कुछ बदला है
आदमी भी
और उसका समाज भी
त्योहारों का स्वरुप भी
ईंट - पत्थरों के बढते
घने जंगल में
चमकती दुधिया रौशनी में
खो गई है चांदनी
तरसने लगी है
जमीं तक पहुँचने के लिए
सरकार के नोटिस पर
जुगनुओं ने  छोड़ दिया है जंगल कबका
उद्योगपतियों के
विशेष आर्थिक ज़ोन के लिए
इस बदलाव के
अंधी दौर में
बाल मजदूरी करते - करते
खो गया है  बचपन भी कहीं .

7 comments:

  1. बहुत अच्‍छा लिखते है, हमारी शुभकामनाएं

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  2. jo hum aise hi badhte rahe, toh aur bure haal honge.. :(

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  3. सब कुछ चाहिए की चाहत में कहीं बहुत कुछ न खो जाए।

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  4. jabardast likha hai aapne...........badhai

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  5. कुछ भी नहीं बदला। केवल इतना हुआ कि, प्रकृति ने मानव के लालच को उजागर कर दिया। अच्छा है कि इस कविता ने यह समझा। प्रयास अच्छा है। डॉ अभिजित् हैदेराबाद विश्व विद्यालय

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  6. जी मेरा धन्यवाद स्वीकारें

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