Thursday, December 17, 2015

तुम्हारे प्रेम के नशें में भी स्थिर हूँ

देर रात
मैं जब भी लिखता हूँ
कोई प्रेम कविता
लोग सोचते हैं
मैं नशें में होता हूँ
सुनो दोस्त,
लोग सही सोचते हैं
मैं उस वक्त
प्रेम के नशें में होता हूँ
दरअसल नशें में तो लोग भी हैं
और नशें में डूबे हर व्यक्ति को
हर कोई नशें में डूबा ही दीखता है
क्योंकि जब वह डोलता है नशें में
डोलती है धरती, डोलता है आसमान
देश में सत्ता के नशें में
हिल रहा है सब कुछ
किन्तु मैं,
तुम्हारे प्रेम के नशें में भी स्थिर हूँ इतना
कि लिख लेता हूँ
तुम्हारे लिए कविता
-तुम्हारा कवि

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार, कल 24 दिसंबर 2015 को में शामिल किया गया है।
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

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