Monday, December 28, 2015

जाते -जाते सूरज ने भी पढ़ा था मेरा चेहरा

आज तीसरे दिन का
तीसरा पहर भी बीतने को है
उदास सूरज पहुँच गया है क्षितिज पर
किन्तु खत्म नहीं हुआ
मेरा इंतज़ार 
जाते -जाते सूरज ने भी पढ़ा था मेरा चेहरा
और उदास हो गया था उसका चेहरा
पता नहीं कैसे भांप लिया था उसने
मेरे भीतर की उदासी
जबकि मैं मुस्कुरा रहा था लगातर
चलो बताओ तुम भी
मेरा चेहरा देखकर
कुछ पता चला तुम्हें !


No comments:

Post a Comment

यही मैं ही इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा

मानव सभ्यता के सबसे क्रूर समय में जी रहे हैं हम हमारा व्यवहार और हमारी भाषा हद से ज्यादा असभ्य और हिंसात्मक हो चुकी है व्यक्ति पर हा...