Sunday, December 27, 2015

यूँ ही खाली बीता भीड़ में तनहा मेरा दिन आज

सोचता हूँ
कि मुक्त कर दूँ तुम्हें
अपने ख्यालों से
और खत्म हो जाए सभी डर
तुम्हारे मन से
दरअसल तुम समझ न पाओगे
कि यह डर तुम्हारा नहीं,
मेरा है...
और मैं नहीं चाहता कि ऐसे डर-डर के
हम मिले...
तुम्हें मुझ पर तरस आता है
किन्तु मुझे आती है तुम्हारी याद
यूँ ही खाली बीता भीड़ में तनहा मेरा दिन आज
मैं सोचता रहा चेहरा तुम्हारा
और मुस्कुरा उठा खुद ही भीड़ में
पता नहीं भीड़ ने क्या सोचा मेरे बारे में
पर मुझे लगा
कि आज याद नहीं किया
तुमने मुझे .........
यूँ ही .....
तुम्हारा कवि 

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