Tuesday, January 2, 2018

बस्तियों में लोग गहरी नींद में सो रहे हैं

साल बदल गया है
किन्तु, 
ज़ुल्म का जश्न जारी है अब भी
सत्ता खुश है
विपक्ष बेहाल है
न्याय की ख़ामोशी नहीं टूटी अब तक 
ज़ख्मों से खून का रिस रहा है लगातर
कान बंद हैं 
चीखें अब सुनाई नहीं देती हमें
सिपाही खड़े हैं सीमा पर शहीद होने को
उनके नाम पर सियासत कायम हैं
दरिया का रंग सुर्ख हो चुका है बहुत पहले
आँखों ने रंगों को पहचानना छोड़ दिया है
सांसे तो चल रही हैं
पर,दिल की धड़कन धीमी पड़ गई है
गाय रंभा रही है नदी के आर -पार
जंगल की आग लगातर फैल रही है
आबादी नज़दीक है
बस्तियों में लोग गहरी नींद में सो रहे हैं
कबीर चीख़ रहे हैं
पर हमने उन्हें सुनना बंद कर दिया है 
राज सभा में शतरंज का खेल जारी है
इस बार अज्ञातवास पर कौन जायेगा
इस पर कोई चर्चा नहीं है कहीं
प्रजा का पलायन जारी है
पर अब राजा न तो अंधा है
न ही बहरा
हाँ, वह नि:संतान ज़रूर है
संतानहीन हो चुके माँ -बाप उससे
अपने बच्चों के लिए इंसाफ़ मांग रहे हैं
और राजा हंस रहा है
उन्हें देख कर !

No comments:

Post a Comment

बहुत साधारण हूँ

जी , मैं नहीं हूँ किसी बड़े अख़बार का संपादक न ही कोई बड़ा कवि हूँ बहुत साधारण हूँ और बहुत खुश हूँ आईना रोज देखता हूँ ... कविता के नाम पर अ...