Saturday, January 6, 2018

दर्द ही जब कैफ़ियत हो

दर्द ही जब कैफ़ियत हो
क्या किया जाये !
मेरी वसीयत में
इक तुम्हारा नाम था 
जिसे तुमने जला दिया
जल कर
जीने की पीड़ा
नहीं समझेंगे दानिश्वर |
बच्चों की भाषा भी कब समझते हैं वे
उन्हें संस्कृति के
बादलों ने ढक लिया है |
मैंने प्रेम किया
खुले आकाश तले तुमसे
गवाह है नदी के घाट,
खुली सड़कें
हरे -सूखे पेड़
और वो पनवाड़ी
जिसने तुम्हें बना कर दिया था
मीठा पान पहलीबार |
जिस तरह था भरोसा मेरा
तुम पर
वैसा ही था
उन पर
जिन्हें, दोस्त माना था अबतक
जैसे माना तुम्हें
अपने जीवन का हिस्सा |
मेरे विश्वास को तोड़कर
मुझे सचेत किया तुमने
मैं आभारी हूँ तुम्हारा
दोस्तों !

7 जनवरी 2017 

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