Saturday, May 13, 2017

समेट लो कुछ रेत वक्त नापने के लिए !

लगता है कविता से दूर हो गया हूँ
जैसे तुम से बिछड़ गया हूँ
बहोत फ़िक्र थी तुम्हें , मेरी
ऐसा मुझे भी लगा था
मेरी आँखें क्यों भीग जाती हैं
 सूखे के मौसम में !
इस रहस्य का पता
केवल तुम्हारे पास है
और तुम
कोई पहाड़ नहीं
मैंने सोचा था मैदान हो
मैं नदी बन कुछ विस्तार चाहता था
अपने अस्तित्व का
पता चला हृदय से मरुस्थल हो
मर गयी नदी
समेट लो कुछ रेत
वक्त नापने के लिए !

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