Saturday, November 14, 2015

कितना आज़ाद था मैं

लिंगमपल्ली के उस छोटे से रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर
राम प्रसाद दुबे कालोनी में
एक दस बाई दस के कमरे में
कितना आज़ाद था मैं
मखदूम मोहिउद्दीन के शहर हैदराबाद में
खुश था मेरे भीतर का कवि
ग़ालिब तुम्हारे तलाश में
ये कहाँ आगया मैं दिल्ली में !
हर तरफ घुटन है
नफ़रत है
प्रेम नहीं तेरे शरह में अब
इर्ष्या फ़ैल चुकी है हवाओं में
घुट रही है मेरी सांसे
जबकि मैं आया था जिन्दगी की तलाश में यहाँ
ओ शहर ..
याद करो तुमने आखरी बार
कब किया था किसी का स्वागत
बाहें फैलाकर !
तुम्हारे फुटपाथों पर
जो अनगिनत क़दमों के निशान हैं
वहां खोज रहा हूँ
मैं लौट जाने का रास्ता .....
-तुम्हारा कवि

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