Wednesday, November 25, 2015

आदमी जब जरुरत की वस्तु में बदल जाता है

आदमी जब जरुरत की वस्तु में बदल जाता है
जरुरत के बने रहने तक ही
वह रहता है सार्थक
जरूरत की समाप्ति के साथ
हो जाता है निरर्थक
इतना असहाय बना दिया जाता है
कि, उसके मुह पर कहा जा सकता है
खत्म हो चुकी है उसकी जरूरत
कचरे के किसी डिब्बे में
कूड़े के ढेर में पड़ा किसी बेकार वस्तु की तरह

विज्ञान की तरक्की के साथ
हमने सीख लिया है
कचरे से खाद, ईंधन और अन्य उपयोगी वस्तु बनाना
पर अभी तक हम खोज नहीं पाए हैं
ऐसी कोई तकनीक
जिससे बना सके
जरूरत के बाद ठुकराए आदमी को उपयोगी बनाना ...
और ऐसे में खो जाता है अंधकार में  
एक व्यक्ति !

..तुम्हारा कवि

1 comment:

  1. Intense poem bringing out the sense of worthlessness of every individual , when used by system and rendered useless. Existentialist in essence but , successfully brings out the despondency and feeling of being used. Bravo

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