Sunday, June 17, 2012

रेत पर खेलते बच्चे


रेत पर खेलते
बच्चे , कितने खुश दीखते हैं
टीले, घरौंदे बनाते
फिर तोड़ते
फिर बनाते
कितने खुश होते बच्चे
अपने सपनों से खिलवाड़ करते
फिर बुनते

नए सपने
मुट्ठी में भरकर 
वे जानते हैं,
साकार नही होते
रेत पर |
फिर भी कितने खुश होते हैं
रेत पर खेलते बच्चे ........



4 comments:

  1. sundar, kavita aage bad sakti hai, ret sirf tile aur gharounde hi nahi banati, pura jiwan rachti hai, is mamle main nand kishore acharya ki rachnaye pade. dusra khilwad hai bad nahi, use sudhar le. mera matlab ret ke vistar se hai, bache sirf ek katat hua prasang nahi ho sakte baki jaha na pachuche ravi waha pachuche kavi.



    .

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    1. Shukriya , maine bachhe or unki kriya kalpon ko dhyan mein rakhkar ye rachna likhi hain ,

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  2. हमारी टिप्पणी स्पाम में गयी शायद??

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    1. फिर से कर दीजिए ..प्रतीक्षा है

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