Tuesday, June 19, 2012

बढ़ रहे हैं शिकारी

खत्म हो रहे जंगल 
फिर भी 
बढ़ रहे हैं शिकारी 
बंदूक नही ,
तोप ,गोली और बम के साथ 

कर रहे हैं निर्माण 
ईंट-पत्थर और लोहे के जंगल 
जहां करेंगे शिकार 
मनमानी ढंग से 

काट दिए जायेंगे वे हाथ
जो उठेंगे ,इनके विरुद्ध
दबा दी जायेगी हर आवाज़

आदमखोर इस जंगल का
हो रहा विस्तार
यहाँ आदमी ,
आदमी का करेगा शिकार

क्या हम मिलकर
रोक पाएंगे इसे ..?

4 comments:

  1. बहुत बढिया ।

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  2. कहाँ रोक पा रहे हैं..............

    सार्थक रचना.

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    Replies
    1. आइये फिर प्रयास करें , आभार

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