Friday, October 30, 2020

मेरी कविताएँ सहम कर कहीं छिप गयी हैं

महामारी ने क्या-क्या संक्रमित किया

पता नहीं,
पर, जो कुछ जीवित है
सब संक्रमित हुए होंगे
एक दोस्त ने पूछा -
ठीक हो तुम ?
मेरा जवाब था -
अब तक संक्रमित नहीं हुआ हूँ
सांसे चल रही हैं
और शायद सोच भी लेता हूँ कुछ -कुछ
कई बार बहुत कुछ !
मेरे जवाब के बाद उसने लम्बी साँस छोड़ी
दरअसल उसका सवाल था -
आजकल कविता क्यों नहीं लिख रहे ?
उसे हैरानी हुई होगी
दुःख हुआ होगा शायद
मैं उसे बताना चाहता था कि
आपदा में कविताएं नहीं
हालात लिखे जाते हैं
रपट लिखी जाती हैं
लाशों के बीच क्या कविता लिखें !
दरअसल कविताएँ भी तो कभी-कभी सहम जाती हैं
मेरी कविताएँ सहम कर कहीं छिप गयी है
महामारी के दौर में एकांतवास ही सबसे सुरक्षित उपाय है
बचे रहने के लिए
मैं तो अपने दोस्त से यह भी कहना चाहता था, कि
एक अस्सी पार युवा क्रांतिकारी कवि
वरवर राव के एकांत पर सोचे हो कभी
चौरासी साल का एक और जवान
स्टेन स्वामी अचानक कैद कर लिए गये
उन्हें तुम जानते हो क्या ?
मैं अपने दोस्त से पूछना चाहता था
उन अनगिनत लोगों के बारे में
जो एकदिन सडकों पर धकेल दिए गये
महामारी से रक्षा के नाम पर
और कहीं गायब हो गये वे !
मैंने नहीं पूछा अपने उस दोस्त से
विस्थापन के दर्द के बारे में
क्योंकि सूखे और बाढ़ की पीड़ा किसान ही भोगता है
भूख से मरे बच्चों की याद तक नहीं आती हमें दाल मक्खनी बनाते वक्त
मेरा दोस्त चाहता है
मैं कविता लिखूं !
मुझे लगता है
अब कवियों को कविता नहीं,
हिसाब लिखना चाहिए
हर ज़ुल्म का
आपदा में बचे रहने का यही उपाय
सबसे कारगर है
कवि के लिए
मैं भूख से मरते एक बच्चे को नहीं बचा सकता
और नहीं छुड़ा सकता एक कवि को कैद से
ऐसे में मैं क्या लिखूं कविता
मेरे दोस्त ??

2 comments:

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