अब कभी -कभी मैं
सूरज को सोचता हूं
उसके अकेलेपन को सोचता हूं
उसकी जलन की पीड़ा को सोचता हूं
कैसे सह रहा है वह
इस जलन को सदियों से
ख़ामोशी से ?
निथर हो कर
मैं यह सोचता हूं .
डरा हुआ व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता मैं बहुत डरपोक हो गया हूं तुमसे मिलने के बाद तुम्हे जान लेने के बाद ! जबकि जानता हूं मैं डरपोक नहीं हूं...