Monday, February 15, 2021

मैं प्रेम की परिभाषा नहीं जानता

 रिक्शे पर खुले आकाश के नीचे

तुम्हारा अंतिम चुम्बन
आज भी अंकित है मेरे गाल पर
मैं प्रेम की परिभाषा नहीं जानता
तुम्हारी खुशबू आज भी बाकी है
मेरी सांसों में
फूल सूख गया है
पर मैंने सम्भाल के रखा है
पंखुड़ियों को
गुलाल के लिए

क्रांति की अपनी विरासत होती है

 गिरफ्तारी,

हिरासत,
हत्या
डरे हुए शासक का परिचय है
पाश को याद करो-
और उग आओ
उसके हर किए-धरे पर
एक दिन वो थक जायेगा
और करेगा ख़ुदकुशी
किसी अंधकार भरे कमरे में
क्रांति की अपनी विरासत होती है
एक इतिहास होता है
जिसमें निस्वार्थ कुर्बानियां
अव्वल हैं
घबराओ नहीं
तापमान बढ़ेगा
बर्फ का पिघलना तय है
तब धरती के सीने पर घास उगेंगे
फूल भी खिलेंगे !!

Saturday, January 30, 2021

महात्मा के लिए

 सम्भव है कि

गोडसे के उपासक भी
सुबह तुम्हारी समाधि पर जाएंगे
तुम्हें श्रद्धांजलि देने
बिलकुल वैसे ही जाएंगे
जिस तरह जाते हैं वो
तुम्हारे आश्रम में
तुम्हारे चरखे पर बैठ तस्वीर खिंचवाने के लिए
किन्तु वो कभी भी नहीं कहेगा
गलत था गोडसे |
सुकून से रहो बापू अपनी समाधि में
यहाँ आग लगी हुई है चारों ओर
यह आग फ़ैल रही है तेजी से पूरे मुल्क में
जंगल की आग की तरह
बुझाने की जिम्मेदारी जिन पर थी
अब वे ही इस आग को हवा दे रहे हैं !
आपका चश्मा अब
विज्ञापन के काम आता है
और आपका चरखा
कैलेंडर की तस्वीर के लिए
आपकी छड़ी और घड़ी का पता नहीं मुझे
आपकी बकरी कहीं नहीं मिली
आपके बन्दर चारों ओर घूम रहे हैं किन्तु
सत्य के साथ आपका अनुभव भी तो ऐसा ही था न ?
बापू तुम दुःखी मत होना
हत्या को अब पाप नहीं मानते यहाँ के लोग!




Monday, January 11, 2021

हम शर्मिंदा नहीं हुए अब तक

 और अन्तत: सूरज खिला

राजधानी की सीमाओं पर बैठे किसानों के चेहरे पर
ओस की बूंदे आज उड़ी हैं
सूरज ने आज अपना काम ठीक से किया है
सूरज जानता है
फसल की बालियों को छूकर ही
उसकी किरणों को मिलता है श्रृंगार
बनते हैं गीत
मिलता है नया रूप
लिखी जाती है कविता
दरअसल सूरज ने नमक का कर्ज अदा किया है
जो उसने सोंका था
चैत में किसान की देह से
किसान की लड़ाई में
आज शामिल होकर उसने
जताया है अब आभार
बजंर धरा पर उसे कोई नहीं पूजेगा
जानता है वह ...
हमने अब तक नहीं चुकाया है
अन्नदाताओं का कर्ज़
हम शर्मिंदा नहीं हुए अब तक
क्यों .....!!

Saturday, January 2, 2021

दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के भीगे हुए चेहरों को सोचिये

 हो सकता है

इस वक्त जब दिल्ली में
आकाश बरस रहा है
और आप रजाई में बैठ
गर्म चाय की चुसकी लेते हुए
अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे हों
ठीक इसी वक्त दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के
भीगे हुए चेहरों को सोचिये
एक बार
ठंड में ठिठुरते हुए
उनके होंठों को सोचिये
आखिर वे क्यों बैठे हैं
क्यों अब तक पांच दर्जन जाने चली गईं?
सोचिये इस सवाल को एक बार
इस वक्त जब उन्हें होना चाहिए था
अपने खेतों पर
वे मजबूर हैं सड़क पर सोने को
इस बारिश से राजपथ चमक उठे शायद
किंतु किसानों के खून का गंध शेष रह जायेगा
सत्ता किसी अपराध पर
शर्मिंदा नहीं होती
किन्तु जो अश्लील ख़ामोशी
हमने ओड़ ली है
उसका जवाब कौन देगा ?


Sunday, December 13, 2020

मैं तो अपने लोगों के साथ सिंघु बॉर्डर पर हूँ

 किसी को नहीं दिखता

जमीन के नीचे
उबलते लावा का रंग
अब पढ़ते हैं
तस्वीर में
मेरा चेहरा
बढ़ी हुई दाढ़ी
और ....
कुछ नहीं
मने मेरा कवि मर गया है
खो गया है कहीं
मैं तो अपने लोगों के साथ सिंघु बॉर्डर पर हूँ
टिकरी पर हूं
मैं चीनी और पाकिस्तानी सीमा पर भी हूँ
ये सत्ता मुझे पहचान कर भी पहचान नहीं पाती है ।
कारण आप जानते हैं
इंक़लाब ज़िंदाबाद कहने के लिए
56 इंची सीना नहीं चाहिए
सिर्फ जागरूक नागरिक होना काफी है ।

Friday, December 4, 2020

उसने बूढ़े किसानों को देश के 'जवानों' से लड़ा दिया है

 अपनी जमीन और देश को भुखमरी से

बचाने की लड़ाई में
शहीद हो गये कई किसान
तानाशाही सत्ता ने पूंजीपतियों से
किसानों की हत्या की सुपारी ली है
वृद्ध शरीर ने वाटर कैनन से निकलती तेज पानी के बौछारों को
डट कर सहा है
सरकारी आंसू गैस के गोले
कंटीले तार के बाड़ों को लांघते हुए
झुर्रियों वाले चेहरे के
अन्नदाताओं ने
सत्ता की नींद उड़ा दी है
खुली सड़क
खुले आकाश के नीचे
इन सर्द रातों में
मेरे देश के धरती पुत्रों को
किसने उतारा है
क्या हम नहीं पहचानते उसे?
वह शैतान
सत्ता के बल पर लगातर हंस रहा है
हमारी कमजोरी पर
उसने बूढ़े किसानों को
देश के 'जवानों' से लड़ा दिया है
जी, हाँ वही जवान जो
इस जमीन की रक्षा करता है
जिस पर किसान अन्न उगाता है

पर अब वो शैतान
किसानों को
कह रहा है -खालिस्तानी ,
देशद्रोही !
उनका जनरल कह रहा है -
देखने से नहीं लगते ये किसान हैं !
और उनके पालतू कुत्ते भी
उन्हीं की बात पर
स्टूडियों से भौंक रहे हैं
मैं कितना असहाय और कायर हो गया हूँ
कि, कमरे में सुरक्षित बैठ कर कविता लिख रहा हूँ
और उन्हीं का उगाया अन्न खा रहा हूँ
जबकि इस देश में अन्न उगाने वाला हर रोज
लगाता है फांसी
पी लेता है ज़हर
अपना हक मांगते हुए
कभी सरकारी बंदूक की गोली से
हो जाता शहीद !!
और तानाशाही निज़ाम उपहास करते हुए कहता है
कोई नहीं मरा है कर्ज़ से
भूख से
मरना उनके लिए फैशन बन चुका है
वे किसी प्रेम प्रसंग में मरे हैं !!



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मैं प्रेम की परिभाषा नहीं जानता

  रिक्शे पर खुले आकाश के नीचे तुम्हारा अंतिम चुम्बन आज भी अंकित है मेरे गाल पर मैं प्रेम की परिभाषा नहीं जानता तुम्हारी खुशबू आज भी बाकी है...