Saturday, July 2, 2022

बच्चों ने कश्ती में सूखे की पीड़ा लिखी थी

बरसात में कभी देखिये
नदी को नहाते हुए
उसकी ख़ुशी और उमंग को
महसूस कीजिये कभी
विस्तार लेती नदी
जब गाती है
सागर से मिलन का गीत
दोनों पाटों को
बात करते सुनिए

हर नदी की किस्मत में
मिलन नहीं है
फिर भी बारिश में नहाती कोई नदी
जब खुश होती है
पहाड़ खोल देता है अपनी बाहें
झूमता है जंगल
खेत खोल देता द्वार
और कहता -
ओ , नदी ...
थोड़ा संभल कर
मुझे सर्दी लग जाएगी !
खेत,
अपने उदास किसान का
चेहरा सोच कर बुबुदाता है !

कहीं दूर
उस नदी किनारे पर बसा गाँव से निकल कर
कुछ बच्चों ने
कागज की कश्ती बनाई थी
वे उसे
नदी में बहा देना चाहते थे

उस कश्ती में
बच्चों ने
अपनी ख़ुशी भर दी
और बताया
कि, पिछले साल
उनके गाँव के किसान ने
सूखे के कारण
अपनी जान दे दी थी
पानी के आभाव में मरे थे कई मवेशी

बच्चों ने कश्ती में
सूखे की पीड़ा लिखी थी
अब उस गांव में सैलाब है!

Friday, June 17, 2022

मुझे आकाश की भाषा नहीं आती ..

 नदी जब मौन हो

नीरव हो रात
ध्यान में बैठे हुए ऋषि की तरह
निथर हो पर्वत,तब
जुगनू क्या कहते हैं
वृक्षों से लिपट कर?
गाँव के सुनसान रास्ते को
गले लगाकर
क्या कहती है चांदनी ...!
टिमटिमाते तारों से कुछ कहता है
आकाश भी
मुझे आकाश की भाषा नहीं आती ...
(2012)

Friday, January 28, 2022

तुमसे दूरी जरुरी थी


रो कर हल्का होना चाहता हूँ
जब कभी याद आता है
तुम्हारे साथ बिताए वक्त
मेरी आँखों में
उभर आता है तुम्हारा चेहरा
जबकि, मैं भूलना चाहता हूँ तुम्हें
तुम्हारी याद रुलाती है मुझे
मैं तुम्हारी यादों से
आज़ादी चाहता हूँ
वजह कोई नहीं थी

बस खुद को खोजना चाहता हूँ

तुमसे दूरी जरुरी थी
इसलिए
खुद को गुमा दिया!!

Tuesday, January 25, 2022

शिशिर में भीगे पत्तों की तरह शांत रहना चाहता हूँ

 बहुत छोटी-छोटी बातों पर

खुश होना चाहता हूँ
इसलिए एकांत में और किसी दिन
बारिश में चौराहे पर भीगते हुए
मैं रोना चाहता हूँ ...
दर्द के साझा होने पर
दोस्त जब पूछने लगे
बताओ -
उम्मीद क्या है!
किसी बच्चे की तरह उदासी छा जाती है मन पर
और पता नहीं ठीक इसी तरह
मैंने भी अपनी बातों से कितने लोगों को दी है उदासी,
दिया है अवसाद !
जीवन का अपना गणित है
जिस तरह मादक सुगंध और फूलों के रंग से
बदल जाता है चेहरे का भाव
जिस तरह दर्द में
किसी अपने के स्पर्श से मिलता है करार
ऐसे क्षणों का अब रहता है इंतज़ार
शिशिर में भीगे पत्तों की तरह शांत रहना चाहता हूँ
और सूरज की किरणों की प्रतीक्षा में
गुजरना चाहता हूँ रात ...

Tuesday, September 28, 2021

इन्सान नमक हराम होता है!

 नमक तो नमक ही है

नमक सागर में भी है
और इंसानी देह में भी
लेकिन,
इंसानी देह और समंदर के नमक में
फ़र्क होता है!
और मैंने
तुम्हारी देह का नमक खाया है!

उच्च रक्तचाप वालों को नमक से
परहेज करना चाहिए
लेकिन आयोडीन की कमी से
वे रोग ग्रस्त भी हो सकते हैं!

इन्सान नमक हराम होता है!

Tuesday, August 10, 2021

'भाग्य-विधाता' तस्वीर में मुस्कुरा रहे हैं

 बहुत अजीब सी ख़ामोशी है

जबकि आतंक लगातार तांडव कर रहा है
हमारे आसपास
इसे भय कहा जाए
या बेशर्मी !
मेरे कमरे से संविधान नामक पुस्तक
गायब है
जिसमें 'लोकतंत्र' और 'न्याय' नामक शब्दों का
उल्लेख है!
'स्वच्छता अभियान' अपनी रफ़्तार में है
लेकिन हमारे आसपास
कचरे का ढेर लगा है
बीमारी फ़ैलाने के लिए मक्खियों के झुंड भिनभिना रहे हैं
हम अब मास्क पहनकर टहल रहे हैं!
पर्यावरण वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है
इसी सदी में दुनिया डूबने वाली है
मानव सभ्यता पर खतरा मंडरा रहा है
जबकि इस वक्त
मुझे 'मानवता' की तलाश है!
अधिनायक की सवारी की तैयारी लगे हुए हैं
सिपाही और प्यादे
क्या नगर में आपातकाल घोषित हुआ है?
चौराहे के कोने में बैठा मजदूर
अपनी बीड़ी सुलगाने को माचिस खोज रहा है !
'फ्री वैक्सीन' के बाद ज़हरीले नारों के बीच
'भाग्य-विधाता' को धन्यवाद देते पोस्टर
खूब चमक रहे हैं
राजधानी की सरकारी भवनों पर
राशन की थैली पर
'भाग्य-विधाता' तस्वीर में मुस्कुरा रहे हैं
कवियों को
सरकारी नौकरी मिल गयी है!

Tuesday, May 11, 2021

इंसानी लाशों की बदबू तो आती होगी आपको भी !

 चिताएं धधक रही हैं

शोक, चीत्कार और पीड़ा के बीच
जारी है जीवन का उत्सव भी
विवाह के मंडप सजाएं जा रहे हैं
उनके तमाम 'भगवान' मास्क पहनकर मंदिरों में
खामोश बैठे हैं
किन्तु इस बीच कुछ सड़ी-गली इंसानी लाशें
नदी में तैर रही हैं
कुछ लोग इस बात से परेशान हैं कि
चिताएं अधिक जल रही हैं इस बार
जबकि कब्रें कम खुद रही हैं !
जबकि वे भी इंसान कहलाते हैं !
इनके इस दुःख का कोई निवारण नहीं है हमारे पास
दुनियाभर के हुक्मरानों, पूंजीपतियों ने कैसे खुद को
सुरक्षित कर लिया है
यह एक राज़ है !
महामारी या वायरस भी डरता है
पूंजी और सत्ता से
किन्तु चर्चा इस बात की है
कि खरबपति बिल गेट्स
अपनी पत्नी से अलग हो रहा है
जबकि यहां लोग बिना उपचार
और बिना ऑक्सीजन के दम तोड़ रहे हैं!
विश्व बैंक, रिज़र्व बैंक, कॉमर्स चैम्बरों की चिंता है
कैसे बढ़ें व्यापार
मुनाफा कैसे बढ़ाएं !
मेरी हैरानी ,
आपको हैरानी न भी हो तो
इंसानी लाशों की बदबू तो आती होगी आपको भी
कैसे रोकते हैं उसे
बताइए हमें भी...
हम सो नहीं सके हैं
कई रातों से .....!!

बच्चों ने कश्ती में सूखे की पीड़ा लिखी थी

बरसात में कभी देखिये नदी को नहाते हुए उसकी ख़ुशी और उमंग को महसूस कीजिये कभी विस्तार लेती नदी जब गाती है सागर से मिलन का गीत दोनों पाटों को ...