की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ
Saturday, October 24, 2026
फिर उदास हो उठेगा मन
मैंने तुम्हें अपना गर्व कहा है !
मैं,
Wednesday, August 21, 2024
युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....
.
1.
मैं युद्ध का
समर्थक नहीं हूं
लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी
और अन्याय के खिलाफ हो
युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो
जनांदोलन से लड़ी जाए हर लड़ाई।
लड़ाई हो तो केवल वंचितों की हक की लड़ाई हो
गुलामों की आज़ादी की लड़ाई हो
लड़ाई हो तो केवल मानवता की रक्षा में हो
लेकिन मैं चाहता हूं
लड़ाई अंतिम विकल्प हो
अगर संवाद के सभी रस्ते बंद कर दिए जाएं।
2.
युद्ध की पीड़ा
गाज़ा के बच्चों, महिलाओं से पूछो एक बार
फिर नहीं करोगे युद्ध की बात
सैनिक की उस अकेली मां से पूछो
जिसका इकलौता बेटा शहीद हो गया है
सत्ता और राजनीति के कारण
युद्ध की भयानकता पूछो
उन बंजर खेतों के किसानों से
जहां बमबारी हुई थी।
कब्रगाह बन चुके
उन शहरों से पूछो जो कभी आबाद थे।
Tuesday, August 29, 2023
इक बूंद इंसानियत
सपनों का क्या है
Saturday, July 2, 2022
बच्चों ने कश्ती में सूखे की पीड़ा लिखी थी
बरसात में कभी देखिये
नदी को नहाते हुए
उसकी ख़ुशी और उमंग को
महसूस कीजिये कभी
विस्तार लेती नदी
जब गाती है
सागर से मिलन का गीत
दोनों पाटों को
बात करते सुनिए
हर नदी की किस्मत में
मिलन नहीं है
फिर भी बारिश में नहाती कोई नदी
जब खुश होती है
पहाड़ खोल देता है अपनी बाहें
झूमता है जंगल
खेत खोल देता द्वार
और कहता -
ओ , नदी ...
थोड़ा संभल कर
मुझे सर्दी लग जाएगी !
खेत,
अपने उदास किसान का
चेहरा सोच कर बुबुदाता है !
कहीं दूर
उस नदी किनारे पर बसा गाँव से निकल कर
कुछ बच्चों ने
कागज की कश्ती बनाई थी
वे उसे
नदी में बहा देना चाहते थे
उस कश्ती में
बच्चों ने
अपनी ख़ुशी भर दी
और बताया
कि, पिछले साल
उनके गाँव के किसान ने
सूखे के कारण
अपनी जान दे दी थी
पानी के आभाव में मरे थे कई मवेशी
बच्चों ने कश्ती में
सूखे की पीड़ा लिखी थी
अब उस गांव में सैलाब है!
Friday, June 17, 2022
मुझे आकाश की भाषा नहीं आती ..
नदी जब मौन हो
Friday, January 28, 2022
तुमसे दूरी जरुरी थी
फिर उदास हो उठेगा मन
की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता कुछ देर पहले तक बालकनी पर बिखरी पड़ी थी चांदनी अब अँधेरा है कुछ ही पल में दरवाजे...
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. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
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गाँधी ने पहनी नहीं कभी कोई टोपी फिर उनके नाम पर वे पहना रहे हैं टोपी छाप कर नोटों पर जता रहे अहसान जैसे आये थे बापू इस देश मे...
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किसी को नहीं दिखता जमीन के नीचे उबलते लावा का रंग अब पढ़ते हैं तस्वीर में मेरा चेहरा बढ़ी हुई दाढ़ी और .... कुछ नहीं मने मेरा कवि मर गया है ख...