रिक्शे पर खुले आकाश के नीचे
तुम्हारा अंतिम चुम्बन
आज भी अंकित है मेरे गाल पर
मैं प्रेम की परिभाषा नहीं जानता
तुम्हारी खुशबू आज भी बाकी है
मेरी सांसों में
फूल सूख गया है
पर मैंने सम्भाल के रखा है
पंखुड़ियों को
गुलाल के लिए
की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता कुछ देर पहले तक बालकनी पर बिखरी पड़ी थी चांदनी अब अँधेरा है कुछ ही पल में दरवाजे...
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteशुक्रिया , सर
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