Wednesday, February 11, 2015

आसान नहीं मिटा देना

वे भूल जाना चाहते थे मुझे
पर कैसे !
इस कठिन प्रश्न से जूझते हुए
सबसे पहले उन्होंने जला डाली मेरी सारी तस्वीरें
फाड़ दिए डायरी के सभी पन्ने
जिनमें लिखा था मेरा नाम
ढक दिया हर उस कोने को
जहाँ मौजूद थे 

मेरे होने का अहसास 

अब उन्हें कुछ -कुछ सफलता का अहसास होने लगा था
फिर आश्वस्त होकर ली उन्होंने लम्बी सांस
और व्यर्थ हो गया सब कुछ !
अचानक
देखा उन्होंने आईना
उनकी आँखों के पानी में
मैं अब भी तैर रहा था !!

Thursday, January 22, 2015

शर्मिंदा नहीं होता सपने में प्रेम करते हुए

मैं अक्सर खो जाता हूँ सपनों में
और कमाल यह होता है कि ये सपने मेरे नहीं होते
दरअसल सपनों में खो जाना कोई कला नहीं
न ही है कोई साज़िस
ये अवचेतन क्रिया है एक

मेरे सपनों में अचानक
उनका आगमन  बहुत सुखद है
मैं बहुत खुश होता हूँ उन्हें पाकर
सपनों में,
रेत पर खेलते उस बच्चे की तरह मैं भूल जाता हूँ
हक़ीकत को
और गढ़ता हूँ  प्रेम की हवाई दुनियां
एकदम फ़िल्मी

अभी यह सर्द मौसम है
रजाई की गर्मी में सपने भी हो जाते हैं गर्म और मखमल

 सपने में अचानक लगती है मुझे  प्यास
और फिर बोतल मुंह से लगाकर पीते हुए पानी
गिरता है सीने पर
टूट जाती है नींद

मैं हँसता हूँ खुद पर
पर शर्मिंदा नहीं होता
सपने में प्रेम करते हुए .

Tuesday, January 13, 2015

हंसाने वाले अब मुझे सताने लगे हैं

मैंने गुनाह किया
जो अपना दर्द तुमसे साझा किया

अब शर्मिंदा हूँ इस कदर
कोई दवा नहीं

मुझ पर इतराने वाले अब कतराने लगे हैं
हंसाने वाले अब मुझे सताने लगे हैं

बातें अंदर की थीं
अब बाहर आने लगी हैं

Thursday, January 1, 2015

हमें भ्रम हैं कि हम जिंदा हैं आज भी

आकाश पर काले बादलों का एक झुंड है
बिजली कड़क रही है
धरती पर आग बरसेगी
इस बात अनजान हम सब
डूबे हुये हैं घमंड के उन्माद में
हम अपना -अपना पताका उठाये
चल पड़े हैं
विजय किले की ओर

वहीँ ठीक उस किले के बाहर
बच्चों का एक झुंड
हाथ फैलाये खड़ा है
हमने उन्हें देखा बारी -बारी
और दूरी बना रखी
कि उनके मैले हाथों के स्पर्श से
गन्दे न हों हमारे वस्त्र
उनके दुःख की लकीर कहीं छू न लें
हमारे माथे की किसी लकीर को
हमने अपने -अपने संगठन के बारे में सोचा
सोचा उसके नाम और उद्देश्य के बारे में
हमें कोई शर्म नहीं आयीं

हमने झांक कर भी नहीं देखा अपने भीतर
हमारा  ज़मीर मर चुका  है
और हमें भ्रम हैं कि
हम जिंदा हैं आज भी ..??

Thursday, December 11, 2014

उन्होंने मुझे बेवफ़ा करार दिया

पिछले दिनों बहुत सोचा
कि कभी नहीं करूँगा खुलासा
उन अपनों के बारे में
जिन्हें मैंने अपना मान लिया था
बीतते वक्त के साथ हटता रहा धुंध
और साफ़ होता गया आइना
मैंने देखा अपना चेहरा
कई रात सोया नहीं मैं
और उन्हें लगा मैं अब तक नशें में हूँ
मैंने ग़ालिब को याद किया
खुद पर गर्व किया
और सोचता रहा जो होने वाला था
आज वही हुआ
उन्होंने मुझे बेवफ़ा करार दिया
और पुलिस ने दर्ज किया केस मेरे खिलाफ़
रिपोर्ट में मुझे देशद्रोही लिखा गया .

Sunday, November 2, 2014

चिड़िया घर में कैद हैं

ईंट -सीमेंट के इस जंगल में
मैं इंसान खोज रहा हूँ ,
सुना है सभी जानवर इनदिनों
चिड़िया घर में कैद हैं।

Tuesday, October 21, 2014

आओ पहाड़ों पर चलें

आओ पहाड़ों पर चलें
जहाँ बचे हुए हैं कुछ वृक्ष आज भी अपने दम पर
झरनों ने अभी दम नही तोड़ा
जीवन बाकी है अभी।
क्या पता मिल जाये कोई वन्य प्राणी टहलते हुए
जिन्हें हम जानवर कहते हैं अक्सर
और वे समझते हैं हमें इंसान
आओ , उन्हें बता दें हम अपने बारे में।

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...