Sunday, September 20, 2009

सूखा रेत

तुम्हारे बाद
अब
मेरी भी सोच बदलने लगी है
अदालत में खड़ा
एक भाड़े की गवाह की तरह
पता नही, अब
मै कब क्या बोल जाऊँ
मै भी अब रुख बदलने लगा हूँ
मेरे शहर में चलती हवाओं की तरह।
रात के बाद
दिन भी कटता हूँ , मै
सोच बदल बदल कर
अब मेरा कोई भरोसा नही
जो था ,
टूट गया कांच की तरह
सोचा था पाषाण हूँ लेकिन
ख़ुद को पाया सूखे रेत की तरह
आज-कल टुकडों में जी रहा हूँ.

1 comment:

इन्सान नमक हराम होता है!

  नमक तो नमक ही है नमक सागर में भी है और इंसानी देह में भी लेकिन, इंसानी देह और समंदर के नमक में फ़र्क होता है! और मैंने तुम्हारी देह का नमक...