Friday, January 24, 2014

पानी पर वृत

शांत जल में पत्थर फेंकने पर 
एक वृत बनता है 
छोटे से बड़ा 
और बड़ा बनता है 
पानी के सीने पर वृत बनाना 
आसान लगता है सबको ......

फेंका हुआ कंकड़ 
पहुँच जाता है तल में 
और ऊपर मिटने लगता है 'वृत'
हम कभी नही बचा पाते
अलग  हुए जल को फिर मिलने से
पानी का यह गुण
नहीं मिलता मनुष्यों में ...
जबकि हम बने हुए हैं जल से 

Friday, December 13, 2013

वो शाम

याद है तुम्हें वो शाम 
जब हम साथ बैठे बरामदे में 
और पी रहे थे चाय एक ही प्याली में बारी -बारी 
मैं भूल नही पाया हूँ 
तुम्हारे स्पर्श को आज तक 

मुझे आज भी याद है 
वो साईकिल की सवारी 
जब तुम बैठती थी अगले हिस्से पर 
और मैं मारता पैडल 
हम पहुँचते युनिवर्सिटी तक
चढाई आने पर जब मेरी
सांसे फूलती
और तुम होती बेचैन
मैं देखता तुम्हारी आँखों में
और पिघल जाता
याद है तुम्हे वो पल ?
नही न ,

जाने दो
यह जरुरी नहीं कि
तुम्हे भी याद रहे
सभी बातें ...
पर यदि कभी लगे कि
खोई हुई यादें चाहिए तुम्हें
ले जाना मुझसे आकर ...
मैंने इन्हें संजोकर रखा है तुम्हारे लिए ..

Wednesday, November 20, 2013

फैक्ट्रियां

जरूरतों की आपूर्ति के लिए 
बनाई गई फैक्ट्रियां,
ये फैक्ट्रियां अब 
बना रही हैं 
बढ़ा रही हैं रोज 
हमारी जरूरतें 

आदमी पहले भी 
बिकता था 
आज भी बिकता है

Friday, October 25, 2013

उस तत्व की खोज

रात भर तेज बारिश के बाद 
सुबह धुले -उजले पत्तों को देखना 
बड़ा सुखद होता है 
तब सोचता हूँ 
कि , पिछली बार 
जिन लाखों लोगों किया था 
संगम पर गंगा स्नान 
क्या इन पत्तों सा चमकता है 
उनका मन और विचार ?

पर्णहरित या क्लोरोफिल नामक जो तत्व
मौजूद है इन पत्तों में
बनाते हैं जीवन भर
भोजन वृक्ष के लिए
हममें वह कौनसा तत्व है
जो उकसाता है हमें
दूसरों का भोजन छीनने के लिए ?

Thursday, September 26, 2013

दोस्ती और दुश्मनी के बीच

दोस्ती और दुश्मनी के बीच
बचा हुआ रहता है
एक रिश्ता, किन्तु 
अभी तक हम खोज नही पाए हैं
कोई मुकम्मल नाम इसका 


यकीनन हम सभी तलाशते रहते हैं
मिठास और कडवाहट से परे
कुछ क्षणों के लिए शिथिल पड़ चुके
रिश्ते के लिए 
एक मकबूल नाम
जिससे कर सके संबोधन
एक –दूजे को

हम मनुष्य हैं
और हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है
कि हम अलग नही कर पाते
अपने अहं को
हमारी अपेक्षा हमेशा
दूसरों से ही होती है
और इसी तरह बनी रहतीं हैं दरारें
रिश्तों में
जिसे भर नही पाता

कोई भी सीमेंट 

Wednesday, September 4, 2013

नही उगा पाये हम कभी अमन के फूल ....

अमन के वास्ते 
हमने बाँट ली 
अपनी -अपनी सरहदें 
पर हर नई सरहद ने जन्म दिया 
एक नई जंग को 
अपने -अपने चमन में 
नही उगा पाये हम 
कभी अमन के फूल ....
और मरते रहें 
अपनी -अपनी मौत .......

Sunday, August 11, 2013

खोजता हूँ एक जंगल

धम्म स्स्स SSSS....
भूस्म ....भौं ..भौं 
गर्र... गर्रर .......
हूस्स ...धत्त ....

जी हाँ ,इनदिनों 
कुछ ऐसी ही भाषा में 
बात कर रहे हैं मेरे समाज में लोग 
आपकी तरह 
मैं भी सुनता हूँ 
पर उस समय मैं
खोजता हूँ एक जंगल
अपने आसपास
मैं कुछ जानवर खोजता हूँ

मन करता है
जंगल में जाकर खींचू उनकी कुछ तस्वीरें
तस्वीर खींचते हुए मुझे देख
वे समझ लेंगे
मैं आया हूँ
इक्कीसवीं सदी की इंसानी जंगल से |

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...