Wednesday, February 22, 2017

मेरा होकर बहुत तनहा रह गया है

दिन भर की तमाम
अराजक घटनाओं को झेल कर
खुद को भरोसा देता था
कमरे पर लौट कर
तुमसे लिपट कर रो सकता हूँ मैं 
तुमने मुझसे विदा मांग ली
और मैं अनाथ हो गया उस दिन
अक्सर अब
कमरे में लौट कर
देखता हूँ बुद्ध की उस तस्वीर को
जिसे तुम्हारी पसंद से
हम साथ खरीद लाये थे
अपने 10 / 12 के कमरे की
खाली दीवार के लिए
बुद्ध की वो तस्वीर
आज भी टंगी हुई है 
मेरे कमरे की दीवार पर
बस अब यह कमरा
हमारा से
मेरा होकर
बहुत तनहा रह गया है

दिन भर जूझता है
अपने अकेलेपन से
मेरी तरह
तुम बताओ
खुश तो हो न
अपने भरे -पूरे घर में
इनदिनों
मुझसे आज़ादी के बाद ?
इस कमरे में
उन 30 दिनों की
यादों के सिवा
कुछ भी नहीं बचा है
मेरे पास |
#तुम्हारा कवि सीरिज से

Monday, February 20, 2017

उसे पहचानों

वो कौन है
जो हमारी इज़ाजत के बिना
हमारे हक़ में
फैसला लेने का दावा करता है?

वो कौन है
जिसका हाथ रंगा हुआ है
इंसानी खून से
और हमारी रक्षा की बात करता है ?

हम क्यों हैं ख़ामोश
अपने ही लोगों की चीखें सुन कर
वो कौन है
उसे पहचानों
जो दोषी है
हमारी तकलीफ़ों के लिए 

Sunday, February 19, 2017

अब जुदा होके

1.
प्रेम में रहते हुए
कभी लिख नहीं पाया
प्रेम कविता
अब जुदा होके
रोना चाहता हूँ 
और निकल आती है
कविताएँ
अब अक्सर
उभर आती है बनारस की गंगा
मेरी आँखों में
जिसे मैंने देखा था शांत बहते हुए
तुम्हारी आँखों में
तुमसे लिपट कर रोना चाहता हूँ
और तुम .....
उफ्फ ....

2.

तुमने मुझे भूला दिया
यह पता है मुझे
मैं तुम्हें
याद नहीं करता
तुम्हें भूला नहीं हूँ 
भूलूँगा नहीं
आखिरी साँस के बाद भी
कवि हूँ तुम्हारा
तुमसे प्यार किया
मैंने !
-तुम्हारा कवि सीरिज से

Tuesday, February 14, 2017

ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग

अंग्रेजी कैलेंडर में दर्ज़
'प्रेम दिवस'
भी आज निकल ही गया
जैसे निकल जाता है रोज के दिन
पर कुछ दिन सच में खास होते हैं
या बना दिए जाते हैं
मुझे बहुत ख़ुशी होती है
जब दुनिया में प्रेम की बातें होती हैं
वर्ना रोज -रोज नफ़रत और जंग की बातों ने
जीवन को नरक जैसा बना दिया है
वैसे मैंने न तो स्वर्ग देखा है
न ही नरक
जो कुछ देखा इस धरा पर देखा है
धरती खुबसूरत है
पर प्यार करने वालों ने इसे और भी खुबसूरत बना दिया है
मैंने आज
नहीं लिखी कोई प्रेम कविता
पढ़ता रहा
सोचता रहा
तुम्हारा चेहरा
अलबम को आज निकालकर तस्वीरें पलटता रहा
थियेटर में अंतिम फिल्म
हमने साथ देखी थी
जंगल बुक का
वो शेर खान
मर चुका था उस फिल्म में
उसे मोगली ने मारा था
मानवीय दिमाग के इस्तेमाल से
तुमने कहा था
फिल्म तो बहाना था
बस कुछ पल
हमें साथ रहने का
वो बहाना था
रिक्शे पर लौटते हुए
भरी सड़क पर
मेरे गालों पर तुम्हारा चुम्बन
इस जनम का ईनाम है मेरा
पता नहीं था कि
ईनाम के बाद बिछड़ जाते हैं लोग
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Saturday, February 11, 2017

बहुत खारा है शहर का पानी

शहर खुबसूरत है
और बदसूरत है शहर का स्वभाव
यहाँ कम्पूटर ही नहीं
आदमी भी 'हैक' हो जाता है
सब लोग नहीं 
पर अधिकतर
शकुनी मामा भी पानी -पानी हो जाते
जो अब की आते आधुनिक इन्द्रप्रस्थ में
चेहरे पर मुस्कान लिए
फ़रेब वाले सब बना लेते उन्हें दोस्त
और बता देते
षडयंत्र कैसे किए जाते हैं
ये आधुनिक शहर
बदल देते हैं दोस्ती की नियत
राजधानी है तो
राजनीति भी होगी
सच बोलने पर मिलती है धमकी
उठाएंगे सवाल चरित्र पर
सबूत बनाएं जाएंगे
जीत के लिए
ईमानदारी किस जन्तु का नाम है ?
पीड़ा में भी हंसने की कला शहर के बाजारों में मिल जाएगी
आप देहाती हैं
यही गुनाह है
ऐसा नहीं कि पूरा गाँव बहुत ईमानदार होता है
पर शहर जितना शातिर भी नहीं होता
शहर मतलब व्यापार केंद्र
ये शहर आपको
भीड़ में तन्हा कर देता है
कल ही पिंटू लौट गया अपने गाँव
उसने कहा बहुत खारा है
शहर का पानी !

Friday, February 10, 2017

मेरी कविता में तुम

उन तमाम पन्नों पर
 लिखे हुए हजारों शब्दों में
मेरी एक भी कविता शामिल नहीं है
क्योंकि उनमें कहीं
मैंने,
तुम्हारा नाम नहीं लिखा है
भूल गया था लिखना
तुम्हारे स्पर्श के अहसास को
दर्ज नहीं कर पाया
तुम्हारे साथ के सुखद पलों को
उन शब्दों में कहीं
इसलिए,
मत खोजना कोई कविता तुम
उन शब्दों के ढेर में
जब मेरी कविता बनेगी तो
उसमें तुम्हारी मौजूदगी का
अहसास होगा तुम्हें |
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*तुम्हारा कवि सीरिज से 

Thursday, May 5, 2016

सपाट प्रेम कविताएँ

हाँ, मेरी प्रेम कविताएँ 
बहुत सपाट होती है 
आड़ी-तिरछी,
उबड़-खाबड़ तरीके से 
नहीं लिख पाता 
मैं प्रेम को |
मेरी प्रेम कविताएँ मोहताज नहीं
किसी
अलंकार और बनावटी शिल्प के |

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...