Tuesday, March 13, 2018

मैं तुम्हारे चेहरे की हंसी बुन रहा हूँ

1.
सुनो, 
नदी में जल रहे 
या 
न रहे, 
मेरी आँखों में 
बाकी रहेगा गीलापन
जब चाहो
तुम
देख लेना
अपना चेहरा
मेरी आँखों में |


2.


मैं,
तब भी तुम्हारे साथ था
जब तुम्हारा नहीं था
कोई परिचय मेरे साथ
और मैं लगातर 
अनुभव करता रहा
तुम्हारे दर्द को |

अकेलेपन में
तुम्हारे दर्द के बारे में
मेरा अनुमान कितना सटीक था
यह तुम ही जानो
मेरा अनुमान आज भी वही है
ठीक मेरे अकेलेपन की तरह
मेरे इस कमरे में
जहाँ मैं हूँ
अपनी तनहाई के साथ
और तुम हो शायद व्यस्त हो
अपनी भरी-पूरी दुनिया में
मैं गिन रहा हूँ
घड़ी की टिक-टिक इस तरह
जैसे डाक्टर गिनता है
दिल की धड़कन बीमारी में
मैं तुम्हारे चेहरे की
हंसी बुन रहा हूँ ......




रचनाकाल : मार्च , 2016



Monday, March 5, 2018

वह चाहता है हर जुबां पर अपना नाम और जयगान

अन्याय
और क्रूर बर्बरताओं की कहानियां
जो हमने किताबों में पढ़ी थी
अब देख रहे हैं
तानाशाही सत्ता उन्माद पर है 
रातोंरात कर लेना चाहता है
सब कुछ अपने नाम
दीवार पर लिखे हर सवाल को मिटा देना चाहता है
बंद कर देना चाहता है हर जुबान को
जो सवाल करती है
सत्ता पर होने के बाद भी
बहुत डरा हुआ है वह
नगर के हर नुक्कड़ और चौराहे पर
बना देना चाहता है अपनी मूर्ति
वह चाहता है हर जुबां पर अपना नाम और जयगान
दरअसल तानाशाह एक डरा हुआ व्यक्ति है
अकसर वह अपनी परछाई से भी डर जाता है
और उसे भी मिटा देना चाहता है
इसलिए वह अंधकार फैलाता है
अकेले में वह चीखते हुए अपने कान बंद कर लेता है
हार कर वह रोना तो चाहता है अक्सर
किन्तु उसकी आँखों में पानी नहीं है

Thursday, March 1, 2018

इस तरह ढय जाता है एक देश

जब देश से भी बड़ा हो जाता है
शासक
और नागरिक से बड़ा हो जाता है
पताका
जब न्याय पर भारी पड़ता है 
अन्याय
और शिक्षा को पछाड़ दें
धार्मिक उन्माद
तब हिलने लगता है
देश का
मानचित्र
इसी तरह से भूकम्प आता है
और ढय जाता है
एक देश |

Tuesday, February 20, 2018

मैं मजाक का पात्र हूँ

जानता हूँ कि
मैं मजाक का पात्र बन चुका हूँ
इस समय सच कहने वाला हर शख्स 
मज़ाक का पात्र है आपके लिए 
हर भावुक व्यक्ति जो
मेरी तरह बिना किसी चालाकी के कह देता है
अपनी बात
वह मूर्ख है
आपकी नज़रों में
मैं जानता हूँ
मुझे उस वक्त अहसास हो गया था
अपनी नादानी का जब
मैंने तुमसे कह दी थी दिल की बात
और तुम पर कर लिया था भरोसा
लोग हँसते हैं मुझ पर
सोचते हैं पागल है
शायद इस वक्त होश में नहीं है
सही कहते -सोचते हैं लोग
तुम्हें सोचते वक्त कब मैं
होश में रहता हूँ भला ?
पर मुझे याद है कि
मेरा भरोसा टूटा तो है
मैं बदले के लिए दुश्मनों का सहारा नहीं लेता
क्योंकि मैंने दोस्त बनाएं हैं
दुश्मन नहीं
पर अब दोस्तों में भी किसी दोस्त को खोजना
बहुत कठिन है
प्रेम मरता नहीं कभी
बस बदनाम होता है जीवन काल में
और मेरा जीवन कुछ लम्बा हो गया है शायद
तुम्हारे लिए !

Friday, February 16, 2018

खोजो


खोजो कि कुछ खो गया है
पर खोजो यह मान कर कि सब कुछ खो गया है
खोजो कि खो गई हैं
हमारी संवेदनाएं
बच्चों का बचपन खो गया है
खोजो, कविताओं से गायब हुए प्रेम को
और सभ्यता की भाषा खो गई है
खोजो कि देश का लोकतंत्र कहाँ खो गया है
सत्ता का विवेक खो गया है
नागरिक का अधिकार खो गया है
मानचित्र तो मौजूद है
कहीं मेरा देश खो गया है
उसे खोजो धरती की आखिरी छोर तक
खोजो कि,
किसान का खेत खो गया है
पेड़ की चिड़िया खो गई है
खोजो इस भीड़ में कहीं
मेरी तनहाई 
खो गई है
खोजो मुझे कि
मैं खो गया हूँ

Tuesday, February 6, 2018

सूरदास खुश हैं ........



आज फिर हाथ लगी पुरानी डायरी , इसमें अधूरी पड़ी एक कविता कुछ सुधार के साथ .........

प्रेम करता हूँ कहना 
आसान हो सकता है 
पर उस प्रेम को को महसूस करे कोई 
सबसे मुश्किल यही है 
दरअसल प्रेम लिखना और प्रेम करना दो अलग-अलग क्रियाएं हैं 
किन्तु दोनों के लिए ही प्रेम का अहसास बेहद जरुरी है
जरा सोचिए जब आप 'प्रेम' शब्द को लिखते हैं 
उस वक्त आपके मन में कैसा भाव उठता है ? 
तब कुछ मीठा सा या कुछ खालीपन भी उभर सकता है मन में 
और उस अहसास को 
हम अलग -अलग शब्दों से व्यक्त करते हैं शायद 
अपने उस प्रेम को हम 
अक्सर मुकम्मल शब्द नहीं दे पाते 
जो काम हम शब्दों से नहीं कर पाते 
अक्सर वह बात व्यक्त हो जाती है आँखों से 
स्पर्श से महसूस कर लेता है कोई 
उस प्रेम को
आजकल हमारी आँखें सूख रही हैं 
हाथ खुरदरे हो चुके हैं 
इसलिए लगातर असमर्थ हो रहे हैं हम 
उस प्रेम को व्यक्त करने में 
आँखों से, 
स्पर्श से !
हमारी भाषा कड़वी हो चुकी है |
हम बाजार में घूम रहे हैं नये नये गैजेट की तलाश में 
जिसके सहारे 
हम क्षण भर में लिख भेज देना चाहते हैं अपना प्रेम 
तभी पता चलता है कि 
किसी गाँव में 
खाप ने मौत की सज़ा सुनाई है एक प्रेमी को 
किसी मौलाना ने जारी किया है कोई फ़तवा 
और किसी माँ-बाप ने मार दिया अपनी संतान को 
प्रेम के अपराध में
बगल में कहीं एक 
राधा-कृष्ण के मंदिर के बाहर मीराबाई 
उदास आँखें लिए 
बैठी हैं 
सूरदास खुश है कि 
वह नेत्रहीन हैं |

रचनाकाल : 22 मार्च , 2014 

Friday, February 2, 2018

तो हैरानी के सिवा बचता क्या है ?

थ्री पीस सूट त्याग कर
घुटनों तक धोती में आकर ही
मोहनदास
महात्मा बने
अब कोई
उनके चरखे के साथ तस्वीर खिंचवाकर
शांतिदूत बनने की तमन्ना रख लें
तो कोई क्या करें !
राजकुमार सिद्धार्थ
लुम्बिनी का राज महल छोड़कर
जंगल -जंगल ज्ञान की तलाश में भटककर ही तो
बने थे गौतम बुद्ध |
अब कोई लाखों का सूट पहिनकर
खुद को फकीर कहें
तो कोई क्या करें ?
हिंसा जिसके शब्दों में व्याप्त हों
वो करें शांति और अमन की बात
तो हैरानी के सिवा बचता क्या है ?
सुकरात के ज़हर के प्याले के बारे में
जिसे कोई ज्ञान नहीं
वह करें त्याग की बातें
तो इसे आधुनिक भाषा में
कामेडी ही कहा जायेगा
अब उसकी हरकतों पर हैरानी नहीं होती
बस हंसी छूट जाती है
उसके तालाबों में
कितनी मछलियाँ जीवित बची होंगी
गोधरा को याद करते हुए
बताइएगा मुझे |

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...