कल शाम बैठा था
मैं नदी के किनारे
मध्यम लहरों को देखता रहा
ख्याल बुनता रहा
लहर टूटते रहे
मेरे ख्याल भी टूटते रहे
लहरों की तरह .
दूर किनारे के पार
डुबते रवि को देखता रहा
वह मुस्कुराता रहा
मुझे देखकर
और मैं उसे देख कर .
मेघों के कुछ अंश
खेल रहे थे
शांत नीलाम्बर मैदान पर
साँझ के शांत मिजाज़ का
लुफ्त उठा रहे थे वे
नही भूलता वह दृश्य
मेरे मन में शमा गया है .
Friday, June 4, 2010
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युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....
. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
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. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
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नमक तो नमक ही है नमक सागर में भी है और इंसानी देह में भी लेकिन, इंसानी देह और समंदर के नमक में फ़र्क होता है! और मैंने तुम्हारी देह का नमक...
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बरसात में कभी देखिये नदी को नहाते हुए उसकी ख़ुशी और उमंग को महसूस कीजिये कभी विस्तार लेती नदी जब गाती है सागर से मिलन का गीत दोनों पाटों को ...
Sahi hai bhai !!!!!
ReplyDeletebhavnaon ki athkheliyon mein doobte utarte yun,
ReplyDeletekahin beh na jana un lahron mein hee,
uss ravi ki ore|
- Nilay