सहमे -सहमे से किउन है सब
स्तब्ध सब किउन है आज
गूंगे से अवाक् किउन है आज ?
गाज गिरी क्या तुम पर आज
कैसे करोगे खुद पर नाज़
उठो , जागो फिर से आज
देखो आकाश में
मंडरा रहे बाज़
नज़रुल बुलाये
तुम्हें --
हाथ में लिए अग्निवीणा का साज़
रणभेरी अब बज चुकी है
देखो कबीर कह रहे हैं
कब तक सहोगे इनका राज ?
देखो आगये बंदर
खुद को कह रहे सिकंदर
क्या यही लिखेंगे
हमारा मुकद्दर ?
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युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....
. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
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किसी को नहीं दिखता जमीन के नीचे उबलते लावा का रंग अब पढ़ते हैं तस्वीर में मेरा चेहरा बढ़ी हुई दाढ़ी और .... कुछ नहीं मने मेरा कवि मर गया है ख...
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अच्छी कविता ...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं.
ReplyDeleteसही में रन भेरी आपने बजा दी //
ReplyDeletesunder post//
Bahoot sundar aur saNchchi kavita.
ReplyDeleteandhoN me kana raja chunNe ki majboori door karne ke liye kuchh soNchna hoga. ek rasta hai:-
http://www.facebook.com/home.php?sk=group_124022917654097&view=doc&id=127525237303865
देखो आगये बंदर
ReplyDeleteखुद को कह रहे सिकंदर
क्या यही लिखेंगे
xxxxxx
क्या बात है ...बहुत खूब ...हार्दिक शुभकामनायें
नित्यानन्द जी बहुत शानदार रचना है आपकी, बधाई स्वीकार करो।
ReplyDeleteआप जैसे मेरे दूसरे राष्ट्रवादी मित्रों से मेरा आह्वान :
यहां इस देश में सबका ज़मीर मर चुका है,
गरीब का पेट खाली और अमीर का घर भर चुका है।
अगर नहीं जागे तो यूं ही मर जाएंगे क्यूंकि,
जिसे बनाया सरकार हमने वो सरदार डर चुका है।
जय भारत - जय हो : रवींद्र सिंह राठी