Tuesday, June 9, 2020

भूख से मेरे लोगों की सूची कहीं देखी है आपने

वो जो बहुत संवेदनशील लगते थे हमें
उनकी बनावटी संवेदनशीलता की बाहरी परत
अब उतर चुकी है
उनसे भूख
और लोगों की मौत पर
सवाल मत पूछिए
वे नाराज़ हो जाएंगे
मैंने भी पूछा था
सड़क पर मरते मजदूरों के बारे में
कहा था उनसे-
आपकी बातों से पेट तो नहीं भरेगा !
उन्होंने मुझे बाहर धकेल दिया
एक अधेड़ उम्र की औरत
कमरा खाली कर चली गयी दो दिन पहले
फ्लैट्स वाले बाबुओं ने उससे
अपने घरों में काम कराने से मना कर दिया
साईकल पर कचौड़ी बेचने वाले एक पिता ने
गांव जाकर ख़ुदकुशी कर ली
वो मुझे भी कवि कहता था
मैंने उसे कविता नहीं सुनाई
एक दिन कुछ पैसे देना चाहा
उसने मुस्कुराकर कहा था - आपकी हालत तो मैं भी जानता हूँ
कमरे में आते-आते भीग गई थी मेरी आँखें
किन्तु चीख़ कर रो नहीं पाया था उस रात
उसे महामारी ने नहीं
उसे व्यवस्था और इस मुखौटाधारी समाज ने मारा है
एक साथी ने फोन पर कहा - पता नहीं आगे क्या करूंगा !
कोरोना मारेगा या ख़ुद ही मर जाऊँगा
लॉकडाउन में भूख तो नहीं रुकी
मौत भी नहीं रुकी
भूख से मेरे लोगों की सूची कहीं देखी है आपने
काम छूटने पर कमरा खाली कर गयी औरत की मैंने कोई ख़बर नहीं ली
ख़ुदकुशी कर चुके उस कचौड़ी वाले के परिवार को
मैंने नहीं देखा !!
सड़क पर चलते हुए मारे गये सैकड़ों मजदूरों को बचाने के लिए
मैं कुछ नहीं कर पाया
अपने तमाम अपराधों में
मैं इसे भी शामिल करता हूँ
मजबूरी या विवशता कह कर इस अपराध से
मुक्त नहीं होना चाहता ....

2 comments:

  1. एक रोटी की फोटो के साथ कई सूचियों में नाम दर्ज करा कर तालियाँ बटोरने के जमाने हैं हजूर जिस देश के नेता तक में वहाँ आप कैसे मेरे (मरे) लोगों की सोच सकते हैं? सुन्दर सृजन।

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