Saturday, April 9, 2011

धोती

मुझे याद है आज भी 
मेरे बाबा धोती पहनते थे 
और हर रोज 
माँ धो देती थी 
बाबा की धोती 
घर के पीछे के 
पोखर के घाट पर बैठ कर
बाबा के मृत्यु के 
तीस साल बाद 
अब कोई धोती नही पहनता
मेरे गाँव में 
गाँव भी अब 
गाँव कहाँ रहा 
शहर की तरह 
बहुराष्ट्रीय कम्पनिओं का 
प्रवेश हो चुका है 
मेरे गाँव में 
अब मेरे गाँव में 
सब जींस पहनते हैं 
मास्टर जी भी 
मैंने पूछा था उन्हें 
धोती छोड़ कर जींस 
पहनने का कारण
मास्टर जी ने कहा था --
यही तो फैशन है आज का
और --
धोती पहनना 
अब उन्हें असहज लगता है 
धोने में भी परेशानी होती है 
क्योंकि तालाब अब सूखने लगे हैं 
और गाँव में भी अब 
पानी की कमी है 
गाँधी जी 
राजेन्द्र बाबू
शास्त्री जी 
और मेरे बाबा 
धोती पहने खड़े हैं 
अपनी -अपनी तस्वीरों में 
कभी यही धोती 
मेरे गाँव -मेरे देश की 
पहचान थी //

Thursday, April 7, 2011

विचलित नहीं हूँ मैं

इन काले बादलों के पीछे 
जो नीला आकाश है 
वह मेरा है 
जरा भी 
विचलित नहीं हूँ मैं 
इन काली घटाओं की भीड़ से 
हवा के एक झोंके की  
प्रतीक्षा है  मुझे .

काश पहले घटी होती यह घटना

हैरानी अब इस बात पर है 
कि तुम्हें सताने लगी हैं 
मेरी परेशानियाँ 
काश पहले घटी होती यह घटना 
तो --
शायद मैं इतना 
परेशान न होता आज इतना 
अब आलम यह है 
कि मैं कह नहीं सकता तुम्हे 
कि तुम --
मत हो परेशान इतना 
मेरी परेशानियों से 
क्योंकि --
अब यह परेशानियाँ 
सिर्फ मेरी है .//

Tuesday, March 29, 2011

अँधेरे में


गहराई रात की 
अँधेरे में 
टिमटिमाते तारों को देखता हूँ 
और याद करता हूँ 
काल कोठरी में कैद 
'दाराशिकोह ' को 
'नजरुल ' को 
भगत सिंह  और राजगुरु को 
और मेरे युग के 
विनायक सेन को 
कहीं किसी उपवन में 
गा रहा है 
नज़रुल का बुलबुल 
विरह गीत 
तभी एका - एक 
बड़ी -बड़ी आँखों के पीछे से 
विद्रोही कवि का 
 प्रेमी हलकी मुस्कान लिए 
खड़े हैं --
फिर विरक्त होकर 
उठा लेते हैं
 रणभेरी  अपने हाथों में 
मैं बतियाने लगता हूँ 
कि--
हे महाप्राण 
मैं आपके साथ जाना चाहता हूँ 
युद्ध के मैदान पर 
फिर सुनने लगता हूँ 
बहादुरशाह जफ़र की ग़ज़ल 
" जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ ......."
दूर शान्तिनिकेतन से 
गुरुदेव कह रहें हैं -
'जोदि तोर डाक सुने केऊ ना आसे, तबे  एकला चलो रे '
और फिर  वेदना भरे दिल से 
बुदबुदाते हैं गाँधी जी -
हे राम -हे राम 
एक असहाय भक्त की तरह //

Thursday, March 10, 2011

मेरी किताबें

दस वाई  दस के कमरे में 
किताबों से भरी हुई रैक 
दिन भर --
किताबें रहती हैं खामोश 
और मैं बोलता रहता हूं उनसे

रात के सन्नाटे में 
जब मैं खामोश रहता हूँ 
मेरी किताबें 
बातें करती है मुझसे .
और सुनाती है  कहानी 
अपने सीने में कैद 
महान हस्तियों की /

तुम्हे मालूम है

तुम्हारी आँख का एक बूंद आंसू
गहरा सागर है
मेरे लिए
और तुम्हे मालूम है
मुझे डुबने से डर लगता है
क्योंकि मुझे --
तैरना नही आता /

Friday, March 4, 2011

......मैंने मांग ली

आज फिर टूट कर गिरा 
एक सितारा जमीं पर 
कुछ ने ---
देखकर उसे मांग ली  कुछ मन्नतें 
और ---
मैंने मांग ली 
उस गिरते सितारे की खैरियत .

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...