Thursday, September 1, 2011

खंडहर

शहर के बीचों -बीच
तन्हा खड़े 
खंडहर की दीवारों पर 
खुदे हुए हजारों नामों के बीच
मैंने कभी नहीं खोजा 
अपना नाम 
यूं  भी कभी
हिम्मत नहीं कर पाया , कि
पत्थरों पर लिखुँ 
मैं अपना नाम 
जब लिख नहीं पाया
कभी किसी दिल पर /

पत्थर तो  सह लेगा 
हर दर्द को 
दिल कहाँ सह पायेगा
नुकीले चुभन की पीड़ा ?
बेजुबान खंडहर की दीवारें 
चीखेगी नहीं कभी 
किन्तु अहसास है मुझे 
चुभन की पीड़ा की /

मेरे भी दिल पर कभी
लिखा था किसी ने 
अपना नाम 
एक लम्बी रेखा खींच कर 
आज कह नहीं सकता यकीन से 
कि -उसे याद है 
उनका  नाम मेरे दिल पर खुदा हुआ 
किन्तु-
बहते लहू धारा का  निशां
आज भी बाकी है
मेरे दिल पर //

Friday, August 26, 2011

मेरी बातें ....


बस तुम से 
तुम तक 
रहे मेरी बातें
जब कभी तुम्हें याद आये 
वो चांदनी रातें 
ठीक मेरी तरह 
हमेशा सुरक्षा का एक घेरा चाहती हैं 
मेरी बातें ....

Sunday, August 14, 2011

आज़ादी की ६५वीं वर्षगांठ की मुबारक बात


सोम से शुक्रवार तक 
जो चिपके रहते थे कम्पुटर से 
सजाते थे आंकड़े 
अमेरिका के लिए 
आज आंकड़ो का अमेरिका 
धरासाई है 
और वे खोज रहे हैं नई नौकरियां 
और --
उधर दिल्ली के 
लालकिले पर चड़कर
भारत के भाग्य विधाता 
दे रहे हैं भाषण ---
राष्ट्र मंडल खेल से लेकर 
मुंबई आदर्श कांड तक 
इस पारी की 
उपलब्धियां है 
और जो मारे गए हैं 
फर्जी पुलिसिया मुठभेड़ में 
रेल दुर्घटना में 
मुंबई ब्लास्ट में 
कर्ज के बोझ से 
बाढ में 
भूख मरी से 
उन सबको दे रहे हैं 
मुबारक बात  
आज़ादी की ६५वीं वर्षगांठ की //
-- 


Wednesday, August 10, 2011

मैं आलिंगन करूँगा तुम्हारा


तुम्हारे वादों पर 
भरोसा नही 
खुद को खोज रहा हूं भीतर 
हो गया अहसास जिस दिन 
 मेरे होने का 
मेरे दोस्त 
मैं आलिंगन करूँगा तुम्हारा .

Wednesday, July 20, 2011

साईकिल वाला लड़का कौन है ?

वह साईकिल वाला लड़का 
कौन है 
जो हर शाम तुम्हारी गली में आकर 
तुम्हारे घर के नीचे 
लगाता है चक्कर ?
मत कहो कि --
तुम नही जानती हो उसे 
कभी नही देखा आज से पहले उसे 
ठीक सूरज ढलते समय 
तुम भी तो खोलती हो 
सड़क की तरफ वाली खिड़की 
और देखती हो बेचैन नज़रों से 
सड़क की ओर 
और वह बांका छोरा
गर्दन घुमाये  देखता है तुम्हें 
मुस्कुराकर //

Wednesday, July 6, 2011

पूर्ण कविता

आज एक नई कविता का 
बीज बो रहा हूं 
इस बीज से -
जब अंकुर फूटेगा , तभी 
मेरी कविता की शुरुआत होगी 
फिर एक 
नन्हे पौधे के रूप में 
बाहर आएगी मेरी कविता 
और तब 
मैं उसे पानी और धूप दूंगा 
किन्तु --
जल्दी  के फेर में 
कोई रसायन नही डालूँगा 
क्योंकि रसायन 
मृदा की उर्वरकता को 
नष्ट कर देता है 
मेरी कविता का पौधा 
विशुद्ध होगा 
एक सुंदर छायेदार वृक्ष बनने तक 
मैं प्रतीक्षा करूँगा 
और जब उस वृक्ष को देखेने  और पढने  के लिए 
पाठक स्वम आयेंगे 
मेरी कविता पूर्ण होगी //

Saturday, June 11, 2011

मामूली बात नहीं

पहले लिखना 
और फिर मिटाना 
आसान काम नहीं 
किन्तु इस कार्य को किया है 
तुमने बड़ी आसानी से 
लिखने और फिर मिटाने की 
यह कला कहाँ से सीखी तुमने ?
तुम्हे भीड़ से छुपाना 
आसान न था 
फिर भी छुपा कर रखा था मैंने तुम्हे 
अपने हृदय में 
और तुमने दिल को ही छेद डाला 
दर्द को छुपाना  आसान नहीं 
आँखों  की  भाषा  
पढने वाले लोग अनेक हैं इस जहाँ में 
जंगल  के सन्नाटे में 
दबे पांव निकल जाना 
मामूली बात नहीं 
और मैं निकल गया 
तुम्हे अहसास भी नहीं हुआ 
यह कमाल है //

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...