Sunday, February 12, 2012

आइ.एम .सारी

भूला नही था 
सन सैंतालिस अभी 
आ गया पचहतर 
आपात बनकर
कुछ -कुछ 
अभी उबरा ही था 
उपचार अभी चल रहा था 
आगया 
सन चौरासी 

कुछ यादें 
हुई धुंधली सी 
उठा था 
संभलने को 
आ गया वर्ष 
दो हज़ार दो 

थका हुआ डाक्टर 
क्या करता 
नम आँखों से 
कह दिया -------
आइ.एम .सारी 

( सन 47 देश विभाजन ,सन 75 आपातकाल , सन 84 सिख विरोधी दंगे , और 2002 गोधरा कांड )

Thursday, February 9, 2012

देवता नाराज़ थे -


खाली हाथ 
वह लौट आया 
मंदिर के दहलीज से 

नही ले जा सका  
धूप -बत्ती ,नारियल 
तो ----
देवता नाराज़ थे 

झोपड़ी में 
बिलकते रहे 
बच्चे भूख से 
भगवान 
एक भ्रम है 
मान लिया उसने

Sunday, February 5, 2012

मुद्दत से उगाया जाता है इन्हें ...................


 कुछ साये 
ऐसे भी होते हैं 
जिनका कोई 
चेहरा नही होता 
नाम नही होता 
केवल
 भयानक होते हैं 
नफ़रत की बू  आती है 
भय का आभास होता है 

कहीं भी हो सकते हैं 
अयोध्या में 
गोधरा में 
इराक या अफगानिस्तान में 
किसी भी वक्त 

इंसानी खून से 
रंगे हुए हाथ 
इनकी पहचान है 

कोई मज़हब नही इनका 
ये साये 
खुद के भगवान्  होते हैं 

खुद नही उगते ये 
मुद्दत से उगाया जाता है इन्हें ...................

Thursday, January 19, 2012

राख हुए सपने



'गुलाबी' के 
सपने तो बहुत थे 
उन्हें तोड़ने वाले 
कहाँ कम थे ?

रंगीन चूड़ियों 
का  सपना 
सहृदय बालम
का सपना 

 सबको अपना
 बनाने का सपना  

जलाई  जाएगी 
उसे केरोसिन डालकर 
नही था 
ये सपना गुलाबी का 
पर ........................
राख हुए सब सपने 
गुलाबी के साथ 


 

Friday, January 13, 2012

गावं से अभी -अभी लौटा हूं शहर में


गावं से
अभी -अभी
लौटा हूं शहर में

याद आ रही है
गावं की शामें
सियार की हुक्का हू
टर्र -टर्र करते मेंढक
सुलटी*के नवजात पिल्ले

कुहासा में भीगी हुई सुबह
घाट की युवतियां
सब्जी का मोठ उठाया किसान
धान और पुआल
आँगन में मुर्गिओं की हलचल

डाब का पानी
खजूर का गुड़
अमरुद का पेड़
मासी की हाथ की गरम रोटियां
माछ-भात

पान चबाते दांत
और ...........
नन्ही पिटकुली* की
चुलबुली बांतें
-----------------------------
*१ हमारी कुतिया
*२ छोटे मामा की ५ वर्ष की बिटिया

Monday, December 19, 2011

हो कभी ऐसा



हो कभी ऐसा
कि मैं भी मुक्त हो जाऊं
उन पुरानी यादों से
मानसिक वेदना
और दिल की पीड़ा से
तब सोचुं मैं
केवल अपने बारे में

फिर कोई
ऐसी शाम आये
जब मैं रोऊँ
बैठकर अकेले में
तब तुम्हें मेरी याद आये

जानता हूं
कल्पनाएँ सच नही होती
लिख रहा हूं फिर भी
तुम्हारा नाम
दीवारों पर
मेरी बुरी आदतों में
ये भी शुमार है
क्या करूँ ...........
मजबूर हूं

Saturday, December 3, 2011

तीन कवितायेँ

१.पतंग  

नीले आकाश में
जब उड़ती हैं
रंगीन पतंगें
और परिंदों का एक झुंड
लगाता है होड़

खूब ढील देता हूँ
मैं अपनी पतंग की डोरी को
छूने  को --
खूब -खूब  ऊंचाई

पर परिंदे माहिर हैं
उड़ान भरने में
जीत जाते हैं ..वे

सीख लेता हूँ  फिर से
ज़रूरी है माहिर होना अपने फन में
जीत के लिए .........


.आंसू  न बहाना 


मेरे शव पर
आंसू  न बहाना
क्योंकि--
पानी में सड़ कर फूल जाता है शव

महज़ औपचरिकता
के नाम पर
मत आना
अंतिम दर्शन को
हंस पड़ेंगे सभी रोते -रोते
तब --
मेरी  मृत देह
सह न पायेगा
तुम्हारा उपहास

बस दबे पावं आकर
ले जाना  जो कुछ
पड़ा है तुम्हारा
मेरे उस कमरे में .....

३. देर होने से पहले 


मेरे पास नहीं है
तुम्हारा पता
और मुझे
खुद का खबर नहीं
पर मैं खोया हुआ नहीं हूँ
ज़मीन की बात है
हूँ  कहीं  इसी जमीं पर
ख़ोज सको तो ख़ोज लो
देर होने से पहले ...........


युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...