Friday, August 4, 2017

एक चिड़िया आकाश पर

अत्याचार,
शोषण -दमन
और तानाशाह के खिलाफ़
हम कविता लिख रहे हैं
नदी किनारे आखिरी वृक्ष मौन खड़ा है
एक चिड़िया आकाश पर फैले
काले धुंए से लड़ रही है !

Thursday, August 3, 2017

तुम मेरा महाकाव्य हो

मैं एक हारा हुआ व्यक्ति हूँ 
इसलिए तुम्हें खोने से डरता हूँ 
तुमने जब 
मुझे 'कवि' कह कर संबोधित किया 
मैंने खुद को तुम्हारा कवि कहा 
तुम्हें छूना चाहता हूँ
पर,
तुम्हारी नाजुकता से डरता हूँ
तुम मेरा महाकाव्य हो |


रचनाकाल : 4 अगस्त 2016 (posted on facebook )

हमसे हुआ नहीं ऐसा

वे चाहते थे कि
मैं भी उनकी भाषा में बोलूं
न बोल सकूं तो कम से कम उनकी भद्दी भाषा का समर्थन करूँ
हमसे हुआ नहीं ऐसा
हम न उनकी भाषा में बोल सकें 
न ही उनका समर्थन कर सकें
उन्हें आग लग गई
उनके पास भी गौ रक्षकों की एक पोषित भीड़ है
जो कभी भी
कहीं भी किसी भी विरोधी की हत्या कर सकती है
पीट कर न सही
अपनी भद्दी भाषा में वे किसी की हत्या करने में सक्षम हैं
मैंने अपना दरवाज़ा बंद कर दिया उनके लिए
उनके डर से नहीं
अपनी भाषा को बचाने के लिए
हम नहीं गा सकते जयगान
उन्होंने मुझे कुंठित कहा
गद्दार भी
जबकि हमने उनका नमक कभी नहीं खाया
सत्ता के कई रूप हैं
पहचानने का विवेक होना चाहिए |

Wednesday, August 2, 2017

कविता मेरी मिट्टी में छिपी हुई है

कविता कहाँ है उन्हें नहीं पता 
उन्होंने नहीं देखा खेत में किसान को
नहीं देखा उन्होंने पसीने से भीगे हुए मजदूर के बदन को
कुम्हार के चाक पर गढ़ते नये सृजन के बारे में नहीं पता उन्हें
तभी पूछा गया यह सवाल 
माँ की गोद में खिलखिलाते शिशु की हंसी को महसूस नहीं किया होगा शायद
बागों में जो फूल खिले हैं
उसमें भी नहीं मिली उन्हें कविता
पहाड़ से निकलती नदी की कल -कल में कविता को खोज नहीं पाए हैं वे
आकाश पर उड़ते पंछियों से पूछा नहीं उन्होंने आज़ादी का मतलब
नफ़रत के सौदागर कभी समझ नहीं पाए प्रेम का स्वाद
और पूछते हैं सवाल
कविता कहाँ है ?
कविता मेरी मिट्टी में छिपी हुई है
बारिश के बाद सौंधी खुशबू के साथ बाहर निकलती है
और मुझे महका देती है |

बेअसर हो गयी तमाम कविताओं को

बेअसर हो गयी तमाम कविताओं को
मैंने जला देना बेहतर समझा
शब्दों का ढेर बेजान सा कागज की छाती पर पड़ा है
लोग बेपरवाह हैं
उन्हें कोई मतलब नहीं कि पड़ोस के घर में आग लगी है 
सड़क पर कोई रक्त से भीगा पड़ा है
किसी गौ रक्षक ने भीड़ के सामने उसकी हत्या कर दी है
भीड़ ने उस हत्या की फिल्म बनाई है
बस उस भीड़ ने उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया
उसी सड़क के किनारे बड़ा सा होर्डिंग लगा है जिस पर देश के प्रधान
बहुत ही स्वच्छ और उज्ज्वल परिधान में खड़े हैं
उस होर्डिंग पर सबसे बड़ी तस्वीर भी उनकी है
और उनके पीछे एक ग्रामीण स्त्री हल्की मुस्कान लिए अपने चेहरे भर के साथ मौजूद हैं
जहाँ एक रसोई गैस का सिलेंडर है ...और लिखा है ... महिलाओं को मिला सम्मान !
'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना'
सिलेंडर से सम्मान इस बात को समझने की जरूरत है
कि सम्मान के लिए कई उपाय है सत्ता के पास
और सम्मान भी सब्सिडी के साथ !
और सब्सिडी सदा के लिए नहीं होती
माताएं खूब जानती हैं इस बात को
पर कहती नहीं
क्योंकि उनके बोलने से ही हलचल पैदा हो सकती है
इसलिए यहाँ महिलाओं को घुंघट में रहने की सलाह दी जाती है अक्सर
और यह भी बता दिया जाता है कि
'खूब लड़ी मर्दानी वो झाँसी वाली रानी थी '*
(सुभद्राकुमारी चौहान की कविता )
और भी बहुत कुछ
माने कि सम्मान जो वे अपनी इच्छा से आपको दें
उसी में संतोष रहो , इसी में मर्यादा है
यही उनका मानना है
जरूरत पड़ने पर रानी पद्मावती की कहानी भी सुनायेंगे
वे किसानों को अन्नदाता कह कर संबोधित करेंगे
और अपने हक़ के लिए सड़क पर उतरे तो गोली चलवा देंगे
वे विश्वविद्यालय में पुस्तकालय नहीं तोप लगाने की पैरवी करेंगे
ऐसा बहुत कबाड़ लिख चुका हूँ
और उन्हें कविता मानता आया हूँ
किन्तु अब लगता है केवल शब्दों का ढेर जमा किया है हमने
और अब जब चारों ओर स्वच्छता का नारा है
बापू का चश्मा भी इस अभियान का सिम्बल बना दिया गया है
और कहीं कोई असर नहीं मेरे लिखने का
ऐसे में उन्हें जला देना ही उचित होगा शायद !

Wednesday, July 19, 2017

मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप
चीख़ कर रोना चाहते हैं
किन्तु रो नहीं सकते !
कैसा लगता है तब ?
तकलीफ़ होती है न ?
मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर
जैसा कि मैं चाहता हूँ
किन्तु रो नहीं पाता हूँ
बहुत घुटता रहता हूँ
जैसे किसी तानाशाही ताकत ने
कैद कर दिया मुझे
किसी कैद खाने में
जहाँ से मेरी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती
मैं करना चाहता हूँ
दर्द और प्रेम का इज़हार एक साथ
पर मेरी आवाज़ और तुम्हारे बीच
बहुत मजबूत एक दीवार है
मेरी आवाज़ भेद नहीं पाती उसे
आओ हम मिलकर
चीखें दीवार की दोनों ओर .....

Sunday, July 2, 2017

बरसात में नदी

बरसात में कभी देखिये
नदी को नहाते हुए
उसकी ख़ुशी और उमंग को
महसूस कीजिये कभी
विस्तार लेती नदी 
जब गाती है
सागर से मिलन का गीत
दोनों पाटों को बात करते सुनिए
कि हर नदी की किस्मत में
मिलन नहीं है
फिर भी बारिश में नहाती कोई नदी
जब खुश होती है
पहाड़ खोल देता है अपनी बाहें
झूमता है जंगल
खेत खोल देता द्वार
और कहता -
ओ , नदी थोड़ा संभल कर
मुझे सर्दी लग जाएगी !
खेत, अपने उदास किसान का
चेहरा सोच कर बुबुदाता है |
कहीं दूर उस नदी किनारे पर बसा गाँव से निकल कर
कुछ बच्चों ने कागज की कश्ती बनाई है
वे उसे नदी में बहा देना चाहते हैं
उस कश्ती में बच्चों ने
अपनी ख़ुशी भर दी है
और बताया है
कि, पिछले साल उनके गाँव के किसान, चिंटू के पापा ने
सूखे के कारण अपनी जान दे दी थी
पानी के आभाव में मरी थी कई बकरियां
बच्चों ने कश्ती में सूखे की पीड़ा लिखी है |
Image result for paper boat in rain

युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....

. 1.   मैं युद्ध का  समर्थक नहीं हूं  लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी  और अन्याय के खिलाफ हो  युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो  जनांदोलन से...