Saturday, October 24, 2026

फिर उदास हो उठेगा मन

 की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ

लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता
कुछ देर पहले तक बालकनी पर
बिखरी पड़ी थी चांदनी
अब अँधेरा है
कुछ ही पल में दरवाजे के सामने
सूरज मुस्कुराएगा
कबूतरों का झुंड उतर आएगा सामने वाली छत पर
दाना चुगने
मीठी धूप में बैठकर अख़बार पढ़कर
फिर उदास हो उठेगा मन

मैंने तुम्हें अपना गर्व कहा है !

 मैं,

उन तमाम
अपराधों की माफ़ी मांगता हूं
जो मैंने कभी
किये ही नहीं
फिर भी
मैं तुमसे माफ़ी मांगता हूं
क्योंकि
मैं,
अब भी तुम्हें
झूठा साबित नहीं कर सकता
क्योंकि
मैंने
तुम्हें
अपना गर्व कहा है।

फिर उदास हो उठेगा मन

  की-बोर्ड पर चलती उंगलियाँ लगातर तोड़ रही हैं कमरे की नीरवता कुछ देर पहले तक बालकनी पर बिखरी पड़ी थी चांदनी अब अँधेरा है कुछ ही पल में दरवाजे...