Saturday, January 2, 2021

दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के भीगे हुए चेहरों को सोचिये

 हो सकता है

इस वक्त जब दिल्ली में
आकाश बरस रहा है
और आप रजाई में बैठ
गर्म चाय की चुसकी लेते हुए
अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे हों
ठीक इसी वक्त दिल्ली की सीमा में बैठे किसानों के
भीगे हुए चेहरों को सोचिये
एक बार
ठंड में ठिठुरते हुए
उनके होंठों को सोचिये
आखिर वे क्यों बैठे हैं
क्यों अब तक पांच दर्जन जाने चली गईं?
सोचिये इस सवाल को एक बार
इस वक्त जब उन्हें होना चाहिए था
अपने खेतों पर
वे मजबूर हैं सड़क पर सोने को
इस बारिश से राजपथ चमक उठे शायद
किंतु किसानों के खून का गंध शेष रह जायेगा
सत्ता किसी अपराध पर
शर्मिंदा नहीं होती
किन्तु जो अश्लील ख़ामोशी
हमने ओड़ ली है
उसका जवाब कौन देगा ?


3 comments:

  1. very true and so sensitive. beautiful poem full with pain!

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  2. very true and so sensitive. beautiful poem full with pain!

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