जो लिप्त हैं अपराधों से
बन बैठे हैं बाबा
पूरे देश में चल रही है
इन्ही बाबाओं की हवा
जिस जंगल में रहते हो
लकड़ी - महुया बीनते हो
अब बिनेगे खाक
किउंकि --
तुम्हारे जंगल पर मंडरा रहे हैं
नेताजी के काक
इसीलिए अब तो
मत रहो अवाक्
जंगल तुमसे ले लेंगे
एक कागज़ पर
आरक्षण तुम्हें दे - देंगे
जंगल में क्या करोगे
भूखे पेट मरोगे
जल्दी - जल्दी शहर में आओ
यहाँ आकर भीड़ बढाओ
ठेकेदार के सामने हाथ फैलाओ
भीख तुम्हें वह दे देगा
इज्ज़त तुम्हारी लेलेगा
फिर नेता जी आयेंगे
संवेदना जताएंगे
आश्वासन देकर जायेंगे इंसाफ का
तुमसे वोट मांगेंगे
दे दिया तो टिकोगे
नही दिया तो पिटोगे
इसी तरह से मिटोगे ?
Wednesday, December 8, 2010
Thursday, December 2, 2010
रणभेरी अब बज चुकी है
सहमे -सहमे से किउन है सब
स्तब्ध सब किउन है आज
गूंगे से अवाक् किउन है आज ?
गाज गिरी क्या तुम पर आज
कैसे करोगे खुद पर नाज़
उठो , जागो फिर से आज
देखो आकाश में
मंडरा रहे बाज़
नज़रुल बुलाये
तुम्हें --
हाथ में लिए अग्निवीणा का साज़
रणभेरी अब बज चुकी है
देखो कबीर कह रहे हैं
कब तक सहोगे इनका राज ?
देखो आगये बंदर
खुद को कह रहे सिकंदर
क्या यही लिखेंगे
हमारा मुकद्दर ?
स्तब्ध सब किउन है आज
गूंगे से अवाक् किउन है आज ?
गाज गिरी क्या तुम पर आज
कैसे करोगे खुद पर नाज़
उठो , जागो फिर से आज
देखो आकाश में
मंडरा रहे बाज़
नज़रुल बुलाये
तुम्हें --
हाथ में लिए अग्निवीणा का साज़
रणभेरी अब बज चुकी है
देखो कबीर कह रहे हैं
कब तक सहोगे इनका राज ?
देखो आगये बंदर
खुद को कह रहे सिकंदर
क्या यही लिखेंगे
हमारा मुकद्दर ?
Sunday, November 21, 2010
धूप पिघल रही है
धूप पिघल रही है
और --
आदमी सूख रहा है जलकर ...
राजा लूट रहा
मंत्री सो रहा है
वकील जाग रहे हैं
विपक्ष नाच रहा है
सड़क पर कुत्ते भौंक रहे है
"मैं " नासमझ दर्शक की तरह
सब कुछ खामोश देख रहा हूं ?
Friday, November 12, 2010
चारमीनार जो खड़ा है
निज़ाम का शहर
हैदराबाद ---
बदल गया है समय के साथ
और --
चारमीनार जो खड़ा है
सदियों से मूक
एक गवाह बनकर
इस बदलाव को
देख रहा है इस बदलते शहर के
तहज़ीब को
बड़ी बारीकी से
पुरानी सड़के अब चमकने लगी है
किन्तु ----
अब भी दौड़ रहे हैं
नन्हे नंगे पैर
उन सडको पर दौड़ती हुई
गाड़ियों के पीछे
उन नंगे पैरों पर दौड़ते
बचपन को सरकार
कल का नागरिक कहती है
इधर लोग रोज़ देख रहे हैं
चारमीनार को
और सोच रहे हैं उसे एक
मूक - बहरा मीनार मात्र
किन्तु --
इसी चार मीनार ने
देखी और सुनी है
हर बार तमाम
भयंकर चीखें .
हैदराबाद ---
बदल गया है समय के साथ
और --
चारमीनार जो खड़ा है
सदियों से मूक
एक गवाह बनकर
इस बदलाव को
देख रहा है इस बदलते शहर के
तहज़ीब को
बड़ी बारीकी से
पुरानी सड़के अब चमकने लगी है
किन्तु ----
अब भी दौड़ रहे हैं
नन्हे नंगे पैर
उन सडको पर दौड़ती हुई
गाड़ियों के पीछे
उन नंगे पैरों पर दौड़ते
बचपन को सरकार
कल का नागरिक कहती है
इधर लोग रोज़ देख रहे हैं
चारमीनार को
और सोच रहे हैं उसे एक
मूक - बहरा मीनार मात्र
किन्तु --
इसी चार मीनार ने
देखी और सुनी है
हर बार तमाम
भयंकर चीखें .
Sunday, November 7, 2010
मेरे ख़त के जबाव में
मैंने लिखे उन्हें ख़त
मिले उन्हें मेरे ख़त
किन्तु जबाव न आया मेरे किसी ख़त का
मेरे ख़त के जबाव में
कोई ख़त न भेज कर
उन्होंने मेरे खतों का जबाव दिया
खामोश रहकर .
मिले उन्हें मेरे ख़त
किन्तु जबाव न आया मेरे किसी ख़त का
मेरे ख़त के जबाव में
कोई ख़त न भेज कर
उन्होंने मेरे खतों का जबाव दिया
खामोश रहकर .
Tuesday, November 2, 2010
खाद्य मूल्य जब बढ रहे थे
जांच का आदेश दे दिया गया
किसी पर आंच न आने पाए
यह भी कह दिया गया .
खाद्य मूल्य जब बढ रहे थे
बित्त मंत्री शेयर बाज़ार के आंकड़े गिन रहे थे
कृषि मंत्री क्रिकेट के लिए पैसे जुटा रहे थे
किसान खेतों में मर रहे थे .
किसी पर आंच न आने पाए
यह भी कह दिया गया .
खाद्य मूल्य जब बढ रहे थे
बित्त मंत्री शेयर बाज़ार के आंकड़े गिन रहे थे
कृषि मंत्री क्रिकेट के लिए पैसे जुटा रहे थे
किसान खेतों में मर रहे थे .
आज़ाद भारत में
आज़ाद भारत में
घुम रहे हैं --
निर्भय होकर शैतान
चोहान -पवार - कलमाड़ी जैसे
मार रहे मैदान .
भूख हड़ताल
शुरू होगया
सुबह नाश्ते के बाद
समाप्त हो जायेगा यह
दोपहर भोजन के बाद .
अनाज सड़ रहा
गोदाम के बाहर
चूहों का हो गया राज
एफ. सी . आइ . के
अफसरों ने
यही किया महान काज .
घुम रहे हैं --
निर्भय होकर शैतान
चोहान -पवार - कलमाड़ी जैसे
मार रहे मैदान .
भूख हड़ताल
शुरू होगया
सुबह नाश्ते के बाद
समाप्त हो जायेगा यह
दोपहर भोजन के बाद .
अनाज सड़ रहा
गोदाम के बाहर
चूहों का हो गया राज
एफ. सी . आइ . के
अफसरों ने
यही किया महान काज .
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युद्ध की पीड़ा उनसे पूछो ....
. 1. मैं युद्ध का समर्थक नहीं हूं लेकिन युद्ध कहीं हो तो भुखमरी और अन्याय के खिलाफ हो युद्ध हो तो हथियारों का प्रयोग न हो जनांदोलन से...
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किसी को नहीं दिखता जमीन के नीचे उबलते लावा का रंग अब पढ़ते हैं तस्वीर में मेरा चेहरा बढ़ी हुई दाढ़ी और .... कुछ नहीं मने मेरा कवि मर गया है ख...
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गाँधी ने पहनी नहीं कभी कोई टोपी फिर उनके नाम पर वे पहना रहे हैं टोपी छाप कर नोटों पर जता रहे अहसान जैसे आये थे बापू इस देश मे...