आज फुर्सत से फिर
चाँद को देखा मैंने
शहर के एक पार्क में बैठे हुए
गोल चाँद की मनभावन मुस्कराहट
बिखर रही थी
पार्क के वृक्षों और लताओं पर
आकाश का चाँद आज खुश था --
कि मैं उसे देख रहा हूं
और मैं खुश था सोच यह
कि वो मुझे देख रहा है --
बैठे हुए इस महानगर के एक निर्जन पार्क में .
चाँद जान चुका है आज , कि
शहरी लोगों के पास
समय नही है उसे देखने की
आफिस , शापिंग -डिस्को से फुर्सत कहाँ है किसी के पास
चाँद को देखने की
वे तो टी . वी . पर चाँद देखते हैं
यों भी चादनी अब
धुंधली सी गई है
प्रदूषण और एडिसन के अविष्कार के आगे
जो थोड़ा वक्त बचता है
उसे टी . वी . खा लेता है
छत पर चड़ने की हिम्मत कहाँ बचती है अब
और बिजली गुम होने पर
गगनचुम्भी इमारतों के घने जंगल में घिरा रहता है आदमी
इस शहरी आदमी के नसीब का पता नही मुझको
किन्तु चाँद को आज
आदमी के नजरों का इंतेज़ार होता होगा शायद .
Wednesday, January 19, 2011
Thursday, January 13, 2011
अभिव्यक्ति का स्वर
बंदूक ,गोली
तोप, बम्ब
बन गए हैं ---
विकास के स्तम्भ /
छोटे होते तन के कपड़े
सास बहू के घर के झगड़े , को
मीडिया बना रही --
नारी मुक्ति और अभिव्यक्ति का स्वर /
नोट के बदले वोट ले- लो
डालर के बदले देश ले -लो
फिर भी वतन प्यारा
बन चुका है नेता जी का नारा /
तोप, बम्ब
बन गए हैं ---
विकास के स्तम्भ /
छोटे होते तन के कपड़े
सास बहू के घर के झगड़े , को
मीडिया बना रही --
नारी मुक्ति और अभिव्यक्ति का स्वर /
नोट के बदले वोट ले- लो
डालर के बदले देश ले -लो
फिर भी वतन प्यारा
बन चुका है नेता जी का नारा /
अनुभव पक रहा है
जहर मिला मुझे
दवा के नाम पर
बेवफाई मिली मुझे
प्रीत के नाम पर
क्षीण हो गया है
जीवन का कोलाहल
जीवन अब बन चुका है
केवल एक हलाहल /
पिस रहा है जीवन
दिन प्रतिदिन
घुन की तरह
जल रहा है जीवन यहाँ
मई- जून की धूप की तरह
अनुभव पक रहा है
टांट पर बचे हुए
बाल की तरह /
दवा के नाम पर
बेवफाई मिली मुझे
प्रीत के नाम पर
क्षीण हो गया है
जीवन का कोलाहल
जीवन अब बन चुका है
केवल एक हलाहल /
पिस रहा है जीवन
दिन प्रतिदिन
घुन की तरह
जल रहा है जीवन यहाँ
मई- जून की धूप की तरह
अनुभव पक रहा है
टांट पर बचे हुए
बाल की तरह /
Tuesday, January 11, 2011
नव वर्ष का पार्लियामेंट सांग-
आओ खेले
चोर -चोर
देश में फैलाये अँधेरा
घन घोर
करने दो जनता को शोर
विपक्ष को लगाने दो पूरा जोर
आओ खेलें हम चोर - चोर .//
चोर -चोर
देश में फैलाये अँधेरा
घन घोर
करने दो जनता को शोर
विपक्ष को लगाने दो पूरा जोर
आओ खेलें हम चोर - चोर .//
Sunday, January 9, 2011
किसानों की बलि
आई. पी .एल में लग रही है
खिलाडियों की करोड़ों में बोली
सुखे - डुबे खेतों में हो रही है
खिलाडियों की करोड़ों में बोली
सुखे - डुबे खेतों में हो रही है
किसानों की बलि.
टू जी में उलझा दिया प्याज में आग लगा दिया
आदर्श का भी अपमान किया
अब बल्ला - गेंद बचा है
चुन लो क्या खायोगे .
Saturday, December 25, 2010
सूरज को सोचता हूं
अब कभी -कभी मैं
सूरज को सोचता हूं
उसके अकेलेपन को सोचता हूं
उसकी जलन की पीड़ा को सोचता हूं
कैसे सह रहा है वह
इस जलन को सदियों से
ख़ामोशी से ?
निथर हो कर
मैं यह सोचता हूं .
Thursday, December 23, 2010
एक काले गुलाम की याद ताज़ा करते हैं वे
जिंदा नही हैं वे
फिर भी जी रहे हैं
मशीनी मानव की तरह
और जाग रहे हैं रात भर
उल्लू की तरह
अमेरिकी दलाल बास की
इशारों पर सिर हिलाते हुए /
एक काले गुलाम की याद ताज़ा करते हैं वे
अपमान सहकर भी
खुश होने का नाटक करते हैं
क्या मैं इन्हें --
मन और चेतना से जीवित मान लूं ?
जानवरों को भी देखा है मैंने
विद्रोह करते --
अन्याय के विरुद्ध
क्या आज का मानव
सच में मजबूर है
एक कैद जानवर से ज्यादा ?
फिर भी जी रहे हैं
मशीनी मानव की तरह
और जाग रहे हैं रात भर
उल्लू की तरह
अमेरिकी दलाल बास की
इशारों पर सिर हिलाते हुए /
एक काले गुलाम की याद ताज़ा करते हैं वे
अपमान सहकर भी
खुश होने का नाटक करते हैं
क्या मैं इन्हें --
मन और चेतना से जीवित मान लूं ?
जानवरों को भी देखा है मैंने
विद्रोह करते --
अन्याय के विरुद्ध
क्या आज का मानव
सच में मजबूर है
एक कैद जानवर से ज्यादा ?
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